लापरवाही और भूल के कारण भक्ति में विघ्न डालते, महात्माओं का कथन

महात्माओं का कथन है किं जीवों के सन्त मत में सम्मिलित होने निमित्त अनुचित और असत्य भ्रम तथा भय कारण से, लापरवाही और भूल के तीन कारण भक्ति में विघ्न डालते, तीनों कारण परमार्थ की घोर कमी, यदि कोई सच्चे परमार्थ कमाना चाहता है तो संसारियों की दशा पर विचार करो, चलो जानते हैं महात्माओं के विचार।

Baba Jai Guru Dev

साधारणतः संत मत के वसूल लाभ और भेद को सुनकर सबको थोड़ी बहुत शान्ति प्राप्त होती है अर्थात जो बाते पूछने योग्य होती है उनका उत्तर ठीक-ठीक और थोड़ा बहुत सान्तवना देने वाला होता है। किन्तु जीवों की समझ बूझ बहुत ओझी है।

सन्त मत की महिमा

इस कारण से वे सन्त मत की महिमा, बड़प्पन और गुण तथा उनके अभ्यास की सरलता और तत्काल प्रभाव दिखलाने वाली शक्ति को जैसा चाहिए नहीं जान सकते। इसका कारण यह है कि पहले उन्हें परमार्थ विषयक ज्ञान बहुत कम होता है।

दूसरे कभी उन्होंने परम प्रभु और उसकी प्राकृति तथा अपने आपके विषय में खोज और विचार नहीं किया। तीसरे सतसंग में नियम से पांच सात दिन तक बराबर खोज की दृष्टि से नहीं आये कि भिन्न-भिन्न वर्णन सुनते समझते, अपने भ्रम तथा संशय को दूर कराते,

जिन बातों का ज्ञान न था उनको जानने की चेष्टा करते यदि कभी सतसंग में आये भी तो एक दिन के लिए, फिर महीनों के बाद एक दिन के लिए आये और फिर चुप होकर बैट रहते हैं। यह ढूँढने का ढंग नहीं है। इससे तो लापरवाही और रूचि की।

लापरवाही और भूल के तीन कारण

न्यूनता प्रगट होती है। महात्माओं का कथन है। इस लापरवाही और भूल के तीन कारण हैं। प्रथम तो संसार के भोग विलास में अत्यन्त लिप्त होना और फंसे रहना तथा कुटुम्ब परिवार से अधिक मोह करना और धन का अधिक लोभ करना।

दूसरे सन्त मत में सम्मिलित होने से इस बात का अनुचित भय कि उनके भोग विलास, लोभ, मोह, संसारी इच्छायें और प्रेम के बन्धन में विघ्न उत्पन्न होता है।

तीसरे जगत और सम्बन्धियों से लज्जा और भय कुल की मर्यादा तथा प्राचीन पारिवारिक रस्में ओर टेकें हैं जिनको छोड़ने में वे अत्यन्त भय खाते हैं।

तीनों कारण परमार्थ की घोर कमी

महात्माओं का कथन यह तीनों कारण परमार्थ की घोर कमी के हैं। सांसारिक कष्टों से निर्भयता तथा मृत्यु की कठोरता (जो प्रत्येक के सिर पर खड़ी हैं।) और संसार और उनके भोगों में अत्यन्त लिप्त रहने के कारण होते हैं। यह कमियाँ केवल सतसंग में सन्तों के वचनों और वाणियों के सुनने से दूर हो सकती हैं। दूसरी कोई युक्ति तथा यत्न उसके हटाने या घटाने की नहीं है।

सन्त मत में किसी का

लोग अपने नेत्रों से देखते है कि सन्त मत में किसी का कुटुम्ब परिवार घर-बार, व्यवसाय और व्यवहार इत्यादि नहीं छुड़ाया जाता हैं। केवल सच्चे महाप्रभु की महिमा सुनाई जाती है उससे मिलने की युक्ति समझाई जाती है। संसार की नाशमानता और संसारियों की स्वार्थी कार्यवाई पर ध्यान आकृष्ट कराया जाता है।

जो कोई थोड़ी रूचि और इच्छा के साथ वचन सुनता और समझता है उपदेश लेकर उस युक्ति का अभ्यास करता है उसको महाप्रभु सन्त सतगुरू दयाल का प्रकाश अपने घट के भीतर दिखाई देता है उनकी दया और कृपा की पहिचान होती है तब वह अधिक रूचि और प्रेम के सात सतसंग और अन्तर के अभ्यास में लगता है।

तब वह अपना समय संसारियों की संगत में व्यर्थ नष्ट नहीं करता किन्तु जहाँ तक सम्भव होता है सतगुरू दयाल की दया का बल लेकर कुछ अधिक समय परमार्थ-कार्य में व्यय करता वह अपना धन भी जहाँ तक बिना कष्ट के सम्भव होता है परमार्थ में लगाता है किन्तु ऐसे व्यक्ति से कुटुम्बी, सम्बन्धियों और बिरादरी वालों को उसकी यह दशा और चाल असहनीय होती हैं

क्योकि उन्होंने सच्चे परमार्थ में न कभी पैर रक्खा है और न कभी सच्चे परमार्थ में धन व्यय किया न उनके मन में सच्चे प्रभु के प्रति प्रीति उत्पन्न हुई।

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भक्ति में विघ्न डालते

इस कारण वे जिस किसी की सच्ची अवस्था परमार्थ में देखते हैं तत्काल चौकते हैं और भयभीत होते हैं कि कदाचित वह धीरे-धीरे घर बार कुटुम्ब परिवार और व्यवसाय आदि छोड़ देगा।

इस निज विचार के कारण वे उसे रोकते हैं धमकी देते हैं, नाना प्रकार के भय दिलाते हैं और उसकी भक्ति में विघ्न डालते हैं। जिस किसी ने सन्त मत को भली भाँति समझ लिया है और अभ्यास करके अन्तर में कुछ रस पाया है वह सतसंग का बल लेकर नित्य प्रति अपनी कमाई करता कुल कुटुम्बी,

महात्माओं का कथन है कि संसारियों की धमकी और चालाकी का विचार मन में नहीं लाता अपितु उनको भी समझा कर उन्हें सच्चे परमार्थ में लगाना चाहता है। यदि वे नहीं लगते तो उनसे वाद-विवाद व्यर्थ की कहा सुनी नहीं करता। उनके हाल और चाल पर उन्हें प्रभु की इच्छा पर छोड़ देता है।

संसारियों की दशा पर विचार करो

अब इन मूर्ख संसारियों की दशा पर विचार करो। यदि कोई उसके कुटुम्ब अथवा नातेदार में से बुरे-बुरे कर्म करता है जैसे

(1) बाजारू स्त्रियों के घरों पर ठहरना और खाना पीना
(2) जुआ खेलना और खिलवाना
(3) अन्य जातियों के साथ शराब पीना व कबाब खाना
(4) असत्य बोलकर धोखा देकर धन कमाना
(5) दूसरो अथवा नीच जाति की स्त्रियों को घर में रखना और उनके साथ रहना इत्यादि,

उसे कोई नहीं कर कह सकता है न धमकाता है न उन्हें जाति से निका न की इच्छा करता है।

यदि कोई सच्चे परमार्थ

किन्तु यदि कोई सच्चे परमार्थ में सम्मलित होकर सच्चे प्रभु की सच्ची भक्ति करता है और कोई विचार नहीं करना चाहिये। मूों और पापियों के समझाने और धमकी इत्यादि का,

अपने सच्चे प्रभु की दया की आशा रखकर, कुछ भी विचार और भय नहीं करना चाहिये। परम महाप्रभु की भक्ति कदापि नहीं छोड़नी चाहिए बल्कि उसे दिन प्रतिदिन दृढ़ करना और बढ़ाना चाहिये।

महात्माओं का कथन है कि:

दिन प्रतिदिन उसके पुराने चाल स्वभाव और रहन सहन को बदलते हुए नेत्रों से देखते हैं फिर भी वे अपनी छोटी समझ और स्वभाव और पापों से भरी हुई बुद्धि के साथ अनेक प्रकार की बाधाएँ उस व्यक्ति की भक्ति में लगाते हैं,

और नाना प्रकार के विघ्न अड़चने (परम प्रभु से निडरता करके) उत्पन्न करने को तैयार रहते हैं। अब समझो कि इन लोगों को शुभ कर्म, अच्छे कार्य और सच्चे प्रभु की सच्ची भक्ति प्यारी है अथवा पाप कर्म बुरे चाल और झूट पसंद हैं। समझदार परमार्थी व्यक्ति को इन लोगों की बातें धमकियों और निन्दा आदि का

गुरू राजी तो करता राजी। काल करम की चले न बाजी॥

Nishkarsh

महानुभाव आपने इस सत्संग पोस्ट के माध्यम से महात्माओं का कथन जाना कि महापुरुषों ने परमार्थ और संसारी के बीच क्या क्रिया हैं आदि तमाम चीजों को पढ़ा।आशा है आपको ऊपर दी गई जानकारी जरूर अच्छी लगी होगी।पोस्ट पढ़ने के लिए धन्यवाद “Jai Guru Dev”

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