बिन पिए नशा हो जाता है आत्म कल्याण का | कौन-सा नशा? Pata Nahin

Pata Nahin कौन-सा नशा आत्म कल्याण का है? यह तो महात्मा ही बताएंगे। एक भक्त पता नहीं जी कौन-सा नशा करता है? जिससे वह संसार इच्छा से मुंह मोड़ लेता है। यह तभी संभव होता है जब महात्माओं का सत्संग हमारी मन पर प्रहार करें। जी हाँ मैं किसी ऐरे गैरे नशे की बात नहीं करने वाला हूँ। हल्का पतला नशा की बात नहीं करने वाला हूँ। उस नशे की बात करने वाला हूँ जिन्होंने राजपाट घर गिरस्ती जमीन जायदाद और बच्चे परिवार सब कुछ छोड़ दिया। चलिए इस सत्संग आर्टिकल के माध्यम से जानते हैं।

बिन पिए नशा हो जाता है आत्म कल्याण का

Pata nahin हल्का पहला नशा नहीं

बात करते हैं या हल्का पहला नशा नहीं है यह जीवन की उस सच्चाई से जुड़ा हुआ है जो सारे नशा और फीके पड़ जाते हैं। क्योंकि जब भी सूरत पर जीवात्मा पर शब्द का नक्शा (Bhakti ka nasa) पड़ता है तो वह इस संसार से परे सब कुछ मोह माया ममता सब कुछ त्याग देता है।

एक ही नशा होता है वह है शब्द का या परमात्मा (Bhakti) का जिसको बड़े-बड़े महापुरुषों ने उपयोग किया और उस उपयोग से उन्होंने अपना आत्म कल्याण किया। लोगों की भलाई भी कि लोगों को भी सच्चा रास्ता दिलाया।

अपनी आत्म कल्याण के लिए ऐसे नशे का उपयोग कर सकते हैं। ताकि हम इस मनुष्य शरीर में आए हैं और इस मनुष्य शरीर की सच्चाई को जान सकें और तो और लोग कहते हैं कि Pata nahin भक्त कौन से नशा करते हैं।

आत्म कल्याण नशा

आत्म कल्याण का नशा या टारगेट यह हमें हमारे जीवन का सर्वोपरि गुरुर कह सकते हैं। क्योंकि मनुष्य शरीर में आए हैं Pata nahin कितने दिन के लिए, कितना सामान इकट्ठा किया, घर गिरस्ती जमीन जायदाद बच्चे सब कुछ बनाए, लेकिन आखिरी समय में यह हमें सब कुछ छोड़कर जाना है।

जीवन की सच्चाई मृत्यु है और मृत्यु हो जाने के बाद हम यह भी पता नहीं लगा पाते हैं कि पूर्व में हम क्या थे? पहले जन्मों में हम क्या-क्या थे? और कहां-कहाँ रहे? क्या गरीब थे क्या या अमीर थे, यह पता नहीं होता है। लेकिन जब भक्ति का नशा चढ़ता है,

तो यह सब कुछ अपने दिमाग से निकाल देते हैं। उसे ना घर गिरस्ती पैसे का मोह नहीं रहता है। बस उसे एक ही नशा राम रस “शब्द रस” Ka Nasa होता है। महात्माओं ने सत्संग के माध्यम से क्या बताया है जानते हैं।

आत्म कल्याण

हम लोग अगर यह बाहर की चीजों को छोड़कर के ठीक जो रास्ता हमको बताया जाय उस पर चल पड़े तो फिर क्या? आप दो दिन में भी, वर्ष और दो वर्ष में भी अनुभव कर सकते हो और नहीं चलते हो तो आप का जीवन व्यतीत हो जाय कुछ नहीं कर सकते हो। तो यह रास्ता सच्चा है बड़ा खुल्लम खुल्ला आपको बताता हूँ।

जो-जो लोग इस रास्ते पर बैठे हैं भाई-मेरा पास तो गुरु महाराज की ऐसी कृपा है कि जो लोग भी आये पहले तो मैंने उनको यही कहा कि खाली नहीं लौटेंगे। जो लोग बैठे दर पर उन्होंने भी यही कहा। हमारे पास तो तमाम लोगों की चिट्ठियाँ भरी पड़ी हैं,

कोई यह नहीं कह सकता साहब हमको नहीं मिला। तो यह दरवाजा बड़ा सच्चा दरवाजा है तो सही है इसमें आत्मकल्याण है और नीचे आत्म कल्याण नहीं। इसमें गुरु और उस प्रभु की प्राप्ति है। नीचे न गुरु मिलेगा और न प्रभु मिलेगा।

मौका मिल जायेगा

Pata nahin आज दुनियाँ नीचे क्यों? गुरु सबके हैं किसके गुरु नहीं हैं? कौन ऐसा है? दुनियाँ में बहुत ही कम ऐसे लोग होंगे मैं तो कहता हूँ शायद ही कोई हो। खानदानी गुरु हो, चाहे साधू गुरु हो, चाहे कोई गुरु हो चाहे मौलवी हो या पण्डित हो किसी को आप ने गुरु किया है कोई न कोई गुरु होगा ही। लेकिन आँखों के पीछे जो चीज फंसी पड़ी हुई है वह ऊपर नहीं जा सकती कभी भी। ।

तो आप को ऊपर जाने वाला गुरु मिल जाये और आप यहाँ बैठ जाओ तो ऊपर से ऊपर ही चले जाओ। तुम्हारा काम भी बन गया। तो इन्द्रियों के जाल से आप बच जायेंगे। इन्द्रियों के विकारों से बच जायेंगे, मन भी इससे उपराम हो जायेगा, इन्द्रियाँ भी भोगों की तरफ से हट जायेंगी।

तो भाई! उस आत्मा के निकास होने का मौका मिल जायेगा। यह विचारी (आत्मा) गुरु हिदायत से गुरु कृपा से, मदद से जरा आगे बढ़ जायेगी जब इसमें ताकत आ जायेगी तो मन के ऊपर में इसकी ताकत हो जाती है मन को यह फिर काबू में (कन्ट्रोल) में रखती है, लेकिन जब तक उसमें वह ताकत नहीं है तब तक मन इसके ऊपर हावी है, बिल्कुल सोलहों आना, इसलिए।

मन के मुरीद और इन्द्रियों के दास

मन मुरीद संसार है, गुरु मुरीद कोई साध मन के मुरीद, मन के दास, मन के गुलाम तमाम लोग संसार में हैं, ” गुरु मुरीद कोई साध’ गुरु का तो वही मुरीद है जो भोगों की ओर से हट गया हो और बिलकुल अलग हो गया हो। भोग विलास, मन, इन्द्रियों को छोड़ चुका हो और मन की सुरत की आत्मा की दोस्ती हो और नाम के साथ में जब जुड़ गये हो,

तब समझना कि गुरु का मुरीद है, वर्ना कहते हैं मन के मुरीद और इन्द्रियों के दास तमाम दुनियाँ दिखाई दे रही है और (संसार) में लगी पड़ी हुई है प्रीति हम लोगों को किससे? उसी चमड़े से। चमड़ा कोई चीज ईंट, पत्थर की समझ लो यह धन दौलत शरीर समझो कुछ भी नाम ले लो यह चमड़ा ही है और क्या इसी में लगे पड़े हैं जान दिये दे रहे हैं।

जिनके ऊपर में नशा

भाई मेरे हाय! हाय! बस रात दिन यही चिल्लाते हैं और महात्मा कहते हैं भाई! उधर आओ तो वह तुमको नूर मिलेगा, वह प्रकाश मिलेगा तुम बिलकुल एक दम से शीतल हो जाओगे। ऐसे ठण्डे हो जाओगे कि जिस वक्त वह गरूर नशा चढ़ता है न, फिर उतरता नहीं।

माफ करना ऐसा नशा है, मैंने कई एक दफे देखा। मैं कलकत्ते में एक दफे गया। एक आदमी खड़ा था डाक्टर उसको क्लोरोफार्म सुंघा रहे थे जब सुंघाया तो घबड़ाया बड़े जोर दुनियाँ में से और उसने दो दफे और वह पोटली (Cap) रख दी समझे बस यही वह जहर है वह नशा है, बस ज्यों इधर का नशा चढ़ा, तो बस मूर्छा आई। फिर आपको इधर बिल्कुल सुला दिया उसने। यह नशा है। जिनके ऊपर में यह चढ़ जाता है अरे भाई! वही जानेंगे।

निष्कर्ष:

महानुभव ऊपर दिए गए सत्संग आर्टिकल के माध्यम से आपने यह जाना कि जब जीवात्मा के ऊपर भक्ति रस या शब्द का नशा चढ़ता है। बिन पिए नशा हो जाता है आत्म कल्याण का। कौन-सा नशा? Pata nahin जीवात्मा कहां-कहाँ सफर करती है और इस संसारी मोह से परे हो जाते हैं। आशा है आपको ऊपर दिया गया सत्संग आर्टिकल जरूर अच्छा लगा होगा। मालिक की दया सब पर बनी रहे। जय गुरुदेव,

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