आत्मा सुख क्या और साधक को सुख अनुभूति कैसे प्राप्त होती है?

आत्मा सुख किसे कहते हैं? आत्मा (Aatma) सुख की अनुभूति कैसे प्राप्त करें? कैसे हमारे अंदर शांति सुकून और आत्मा को सुख प्राप्त हो, यह अनुभूति हम कैसे कर सकते हैं? आदि तमाम प्रकार की जानकारी बाबा जयगुरुदेव जी के द्वारा पूर्ण सारांश दिया गया है।आप इन सत्संग लाइनों को पूरा पढ़ें, आपको आत्मा सुख के बारे में पूर्ण ज्ञान हो जाएगा। जो महापुरुषों ने आपने संदेशो में सुनाया है…

Jai Gurudev
Jai Gurudev

अपने संदेश में बताया है कि आत्मा की अनुभूति, मन की शांति और इस शरीर मैं कैसी अनुभूति होती है? यह तमाम जानकारी महापुरुषों ने अपने संदेश में लोगों को सत्संग के माध्यम से बताया है। चलिए शुरू करें, जय गुरुदेव।

आकाश मिलने पर (Akash milne par)

बाबा जी ने कहा है कि जब एक साधक साधना पर बैठता है। साधक के क्या-क्या करतब होना चाहिए, गुरु के प्रति साधक के क्या कर्तव्य होना चाहिए? साधना करते समय साधक को आकाश मिलने पर कभी-कभी साधक के सामने आकाश-सा मालूम होता है और फिर ऐसा मालूम होता है जैसे कि धुआं होता है। धुये के वक़्त साधक को कुछ दिखाई नहीं देता है।

आकाश मिलने पर
आकाश मिलने पर

साधक को चाहिए कि अपनी दृष्टि उसी धुये के सामने रखें। कुछ देर बाद धुये जैसा आकाश साफ़ होगा और निर्मल आकाश नज़र आएगा। साधक को उस निर्मल आकाश को देखना चाहिए. आकाश में जब साधक देखेगा तो उसे एक अद्भुत आकाश बंध हुआ नज़र आएगा। इसके देखने से साधक को ज़रूर मालूम होता है। अब हम बात करते हैं आत्मा सुख क्या है कैसे अनुभव किया जा सकता है।

आत्मा सुख क्या है? (Aatma sukh kya)

एक साधक को प्रतीत होता है जैसे कि क्लोरोफॉर्म का नशा होता है। इसी तरह सुरत में एक नशा प्रारम्भ होता है। यह वही नशा है जिसे गोस्वामी जी ने आत्मानंद कहा है। क्या कहूँ आत्मा सुखी की महिमा जिन्हें प्राप्त सोइ जाना।

आत्मा सुख
आत्मा सुख

साधक भी इस आत्मा सुख को पा सकता है। साधक बगैर गुरु की कृपा के आत्मा सुख प्राप्त नहीं कर सकता है। इसी आत्मा सुख को पाने के हेतु मनुष्य राजगद्दी पहले से त्याग देता है और उसी आत्मा सुख की खोज में लग जाता है।

साधक के ऊपर गुरु की बहुत बड़ी कृपा है कि सब सामानों के बीच रहते हुए आत्मा सुख प्राप्त हो जाता है। इसी आत्मा सुख को चित आनंद स्वरूप कहा है और इसी को गोस्वामी जी ने जड़ चेतन ग्रंथि करके वर्णन किया है। इसी आत्मा सुख को कहा हैं।

“परम प्रकाश रूप दिन राती, नहीं कुछ चहिए दीया घृत बाती”

चरन कमल की महिमा क्या है? (Charan kaval mahima)

साधक जब अपने अंतर में यह परम प्रकाश प्रगट कर लेता है तो बहुत बड़ी ख़ुशी होती है। यही आत्मा सुख का वह स्थान है जहाँ आत्मा साक्षात्कार होता है। इसी को संतो ने तीसरा दिल बयान किया है। यही प्रथम स्थान सुरत के जगाने का है। इन्हीं को चरण कमल कहते हैं।

इन्हीं चरणों का ध्यान करने से साधक की दिव्य आँख खुल जाती है। इन्हीं चरणों के ध्यान अथवा साक्षात्कार से सुरत को अपने निजी रूप का अनुभव होता है। यही चरण कमल हैं जिनके प्राप्त करने से सुरत को अलौकिक शक्ति प्राप्त हो जाती है।

चरण कमलों को पाने के लिए
चरण कमलों को पाने के लिए

इन्हीं चरण कमलों में ऋद्धिया सिद्धियाँ प्रगट हो जाती हैं। यही चरण कमल हैं जिनको सीता जी ने पाया था। इन्हीं चरण कमलों का साक्षात्कार राजा जनक को हुआ था। इसी वास्ते राजा जनक को विदेही कह लाए थे, इन्हीं चरण कमल को पाकर सीता जी विनय करती है कि

“सुनो बिनय मम विटप अशोका, सत्यनाम कर हर मम सोंका”

चरण कमलों को पाने के लिए (Bhagvaan ko paane ke liye)

यही चरन है जो कि सतलोक से आकर चिदाकाश में ठहरे हैं। आकाश ऊपर है और चरन उसी आकाश में जड़े हैं। इनकी शोभा का वर्णन नहीं हो सकता है। ज्ञानी इन्हीं चरणों की महिमा अहम् ब्रह्मास्मि में कहते हैं। परंतु उन्हें इन चरणों को पाने में बहुत ही बैराग ज्ञान विवेक करना पड़ता है। इन्हीं चरण कमलों को पाने के लिए गुरु की परम आवश्यकता पड़ती है।

इन्हीं चरणों को पाने के हेतु साधक को यह करना होगा कि अपना सर्व अंग गुरु को अर्पण कर दे। सर्व अंग गुरु अर्पण से विकार बासनाये नहीं सताती है और अपने स्वाभिमान का त्याग हो जाता है। जब तक साधक को भेदी गुरु नहीं मिलेंगे तब तक साधक चरणों का दर्शन नहीं कर पाता है।

अनेकों जन्मों के पर्दे सुरत के ऊपर दोनों आंखों के पीछे गिलाफ की तरह चढ़े हैं और इस जन्म का भी पर्दा चढ़ा हुआ है यानी जो कर्म अभी करता है उसका अक्स भी आंखों के लेंस में होकर सुरत के ऊपर चढ़ता जाता है और सुरत को जड़ रूप में करता जाता है।

सुरत की दिव्य दृष्टि (Divya Drasttri)

जब तक साधक के ऊपर गुरु कृपा नहीं होगी तब तक साधक बाहरी वासनाओं का त्याग नहीं कर सकता है। साधक वासनाओं के वशीभूत हो चुका है जिसे छोड़ने में महान कठिनाई पड़ती है। गुरु का परिश्रम साधक के साथ प्रथम में यही होता है कि साधक अपनी वासना ख़त्म करें जिसके द्वारा साधक भोगो में फंसकर अकरम करने लगता है।

साधक गुरु वचन सुनकर अपनी इच्छाएँ गुरु शब्द के साथ लगाकर काट देता है। गुरु शब्द के साथ साधक यदि बंदा नहीं है तो साधक हमेशा इच्छाओं का गुलाम रहेगा। इच्छाओं का गुलाम साधक अंतर में गुरु चरन अथवा राम चरन अथवा कृष्ण चरन प्रगट नहीं कर सकेगा।

सुरत की दिव्य दृष्टि
सुरत की दिव्य दृष्टि

चूकि साधक का हृदयस्थल पानी की तरह हिलोर मारता रहेगा इसका परिणाम यह होगा कि जब हृदय में स्थिरता ना आए तो सुरत की दिव्य दृष्टि नहीं खुलेगी। मन चित्त चंचल होने से साधक अपनी दिव्य आँख अंतर के तिल पर ना जमा सकेगा।

साधन करते समय (Sadhna karte samy)

साधन करते समय साधक नियम से रहे तो साधक को अधिक लाभ होता है। साधक के अंदर विश्वास की मात्रा जहाँ तक हो अधिक से अधिक पैदा करना चाहिए. जब साधक अंतर में प्रकाश पाना शुरू कर देता है उसी वक़्त सावधानी साधक को रखना चाहिए,

क्योंकि प्रकाश के प्रगट होते ही अपने कर्मों को देखता है जहाँ कर्म ख़ुद उसी समय प्रकाश में लोप करने की कोशिश करते हैं। जैसे पानी यदि मशीन में भरा है और नीचे कीचड़ जमा है कैसे ऊपर जाएगा? जब हिलोर पैदा हो तब कीचड़ ऊपर आबे। कीचड़ ऊपर आने पर निर्मल पानी गंदा ज़रूर करेगा।

इसी तरह साधक जब गुरु कृपा से साधना करता है अंतर में प्रकाश आने लगते हैं तो कर्मों के हिलोर से प्रकाश गंदा हो जाता है। उस समय साधक सोचता है कि गुरु की कृपा खिच गई या गुरु दया नहीं कर रहा है। साधक को समझ लेना ज़रूरी है कि गुरु हिदायत के साधन करता रहे कुछ समय बाद प्रकाश साफ़ हो जाएगा और निर्मल प्रकाश पैदा हो जाएगा।

साधन करते वक़्त साधक को (Sadhak ki sadhna)

साधक को घबराहट से साधन ढीला नहीं कर देना चाहिए, साधक अपनी बुद्धि गुरु चरणों में बाँध दे और गुरु के शब्द याद करता रहे। यही अति आवश्यक है। साधक को गुरु शब्द याद करने से यह लाभ होगा कि जब साधक साधन में बैठेगा। उस वक़्त मन इंद्रियाँ उसे भोगो की ओर नहीं खींच पायेगी।

साधन करते वक़्त साधक को स्वभाव के अनुसार मन इंद्रिय तंग करती हैं और साधन के वक़्त साधन में ना लगकर भोगों की ओर खींचती हैं।अभ्यास का मतलब यह है कि साधक साधन करने का प्रयास डालें और-और भोग छोड़ने का स्वभाव साधन के द्वारा करें।

साधक को स्वभाव पड़ा था भोगों की ओर वह साधन से कम होगा। जब साधक साधन में पकने लगे और भोग की ओर से इंद्रियाँ अपने स्वभाव को कम कर दें या बिल्कुल ना करें तो साधक को समझ लेना चाहिए कि गुरु की कृपा है और गुरु की दया के हम पात्र बन गए हैं।

निष्कर्ष

प्रेमियों आपने इस आर्टिकल में परम संत बाबा जयगुरुदेव जी द्वारा सुनाए गए सत्संग को आपने पढ़ा, आत्मा सुख क्या और साधक को सुख अनुभूति कैसे प्राप्त होती है? साधना में साधक के क्या कर्तव्य और क्या करना चाहिए, आदि बातों को आपने इस आर्टिकल के माध्यम से जाना। आशा है आपको ज़रूर गुरु के चरणों के प्रति श्रद्धा और विश्वास प्रकट होगा। इन सत्संग शब्द को अपने सोशल नेटवर्क पर शेयर करें, जय गुरुदेव

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