Kabir Saheb की एक घटना। सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे

अपना झरोखा खोलने से पहले कबीर साहब (Kabir Saheb) की एक घटना सुना दूं। महात्मा बहस मुवासे के चक्कर में पड़कर समय बर्बाद करना नहीं चाहते। इसलिए कोई न कोई वह ऐसा रास्ता निकाल लेते है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। चलिए इसी क्रम में Kabir Sahib की एक घटना को जानते हैं। स्वामी जी महाराज ने अपने सत्संग के माध्यम से लोगों को बताया। आप इस सत्संग आर्टिकल को पूरा पढ़ें, “जय गुरुदेव” तो चलिए स्टार्ट करते हैं।

Kabir Sahib की एक घटना
Kabir Sahib की एक घटना

Kabir Saheb Ki. कबीर साहब की एक घटना

कबीर साहब (Kabir Saheb) के समय में एक बहुत बड़े विद्वान पण्डित काशी में रहते थे। जब कबीर साहब की ख्याति फैली तो कुछ लोगों ने उनसे कहा कि कबीर जुलाहा होकर ब्रह्मज्ञान की बातें कर रहा है आप उससे शास्त्रार्थ क्यों नहीं करते हैं? पण्डित जी के मन में बात जम गई।

उन्होंने कहा कि मैं Kabir से शास्त्रार्थ करूंगा और उन्होंने कबीर के पास खबर भिजवा दी। Kabir Saheb चुपचाप बैठे सोच रहे थे कि क्या किया जाये? उनकी बेटी कमाली आई और उनसे पूछा कि आप किस सोच में हैं? कबीर मुस्कुराये और बता दिया कि पंडित जी आने वाले हैं करेंगे। वही सोच रहा हूँ। उनकी बेटी बुद्धिमान थी। उसने कहा कि मैं शास्त्रार्थ कुछ करूं आप नाराज तो नहीं होंगे? वह बोले कि नहीं।

Kabir Saheb की

कमाली ने दो तीन पत्थर के टुकड़े लिये, एक लाल कपड़े में उसे बाँधा और जाकर जिस रास्ते से पंडित जी महाराज उधर से आ रहे है तो उसने पत्थर सिर पर रखा और धीरे-धीरे अपने घर की तरफ चलने लगी। पण्डित जी पास आए तो उससे पूछा बेटी कबीर का घर कौन-सा है?

वह बोली कि वह सामने है उनका घर। मैं उनकी बेटी हूँ। पण्डित जी ने पूछा कि ये सिर पर क्या रखा है? वह बोली कि महाराज आज एक बहुत बड़े पण्डित जी महाराज मेरे पिता जी शास्त्रार्थ करने आ रहे है तो पिता जी ने ये शिल्टैन शास्त्र मंगवाया है वही लेकर जा रही हूँ क्योंकि इसी पर चर्चा होगी। यह कहकर लड़की चल दी।

पण्डित जी बड़े सोच विचार में पड़ गए कि ये कौन-सा नया शास्त्र Kabir Saheb ने मंगवाया। इसका तो मैंने नाम भी नहीं सुना। मैं तो कुछ बोल ही नहीं पाऊँगा। यह सोच कर अपनी हार के भय से पण्डित जी वापस लौट गए।

महात्मा बड़े दूरदर्शी होते हैं। (Mahatma)

कहने का मतलब ये है कि महात्मा बड़े दूरदर्शी होते हैं। ऐसे ही एक बार आर्य समाजियों ने प्रचार किया था कि जयगुरूदेव बाबा (JaiGuruDev Baba) शास्त्रार्थ करेंगे। आर्य समाजियों ने जमकर प्रचार किया। कुछ सत्संगी घबड़ाये हुए थे कि ये सब क्या करेंगे। स्वामी जी ने हंसते हुए कहा कि घबड़ाने की क्या बात है। वह तो तुम्हारा ही काम कर रहे है। जितना प्रचार वह कर रहे है हमारा उतना तो तुम लोग भी नहीं कर सकते थे।

शास्त्रार्थ करने का इतना बड़ा प्रचार किया गया कि शाम को Satasang के समय बड़ी भारी संख्या में जन उपस्थिति हुई सत्संग पाण्डाल के ठीक दूसरी तरफ सामने आर्य समाजियों ने अपना मंच बनवाया और माइक लगाया। जब स्वामी जी महाराज सत्संग मंच पर पधारे तो उन लोगों ने माइक लगाया। जब स्वामी जी महाराज (Maharaj) सत्संग मंच पर पधारे तो उन लोगों ने माइक से जोरदार नारा लगाया। नकली तुलसी के बच्चे हो, शास्त्रार्थ करो।

स्वामी जी ने कहा (Baba JaiGuruDev Ji)

स्वामी जी महाराज ने जयगुरूदेव कहा और सत्संग शुरू किया तो उन लोगों ने कुछ शोर मचाया लेकिन उसी के बाद उनका माइक फेल हो गया। स्वामी (JaiGuruDev Ji) जी महाराज ने पूरा सत्संग किया। वातावरण बिल्कुल शान्त था। सत्संग समाप्त होने पर स्वामी जी ने कहा कि पहले देवियों को पाण्डाल से बाहर निकालो। कोई पुरुष नहीं उठेगा। 10-12 लोग जो कार्यकर्ता थे उन लोगों ने एक-एक करके औरतों को बाहर निकाला।

उसके बाद स्वामी जी महाराज बाहर निकले। उसके बाद सारे आदमी पाण्डाल से बारह आए सब कुछ बहुत शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुआ। इसका प्रतिक्रिया ये हुई कि आर्य समाजियों की छवि खराब हुई। लोगों ने तरह-तरह की आलोचना की और बाद में ये भी सुनने को मिला कि जो लोग मंच पर चढ़कर चीख चिल्ला रहे थे वह आपस में पैसे के भुगतान को लेकर लड़ पड़े थे।

निष्कर्ष

कहने का मतलब है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे इस प्रकार से Kabir Saheb ने भी अच्छे अच्छों को अचंभित किया। ठीक उसी तरह से बाबा जयगुरुदेव जी महाराज ने भी लोगों को उदाहरण के तौर पर समझाया है और लोग भोचक्क रह गए और लोगों को अपना सलूशन मिल गया है। आशा है आप को ऊपर दिया गया बाबा जयगुरुदेव सत्संग आर्टिकल जरूर अच्छा लगा होगा। “मालिक की दया सब पर बनी रहे” जय गुरुदेव

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