मानव शरीर में बैठी जीवात्मा एनी सुरत कैसी दिखती है महापुरुष बताते हैं

सुरत कैसी: जय गुरुदेव महानुभाव, संत महात्मा ने surt शब्द का बखान किया और उसका दर्शन दीदार किया और लोगों को करा रहे हैं।ऐसे पूर्ण महात्मा कि यदि हम खोज करेंगे तो वह हमारी सुरत यानी जीव आत्मा का साक्षात्कार जरूर करवाएंगे। ठीक ऐसे ही महापुरुष जयगुरुदेव जी महाराज ने सुरत शब्द का स्थान रूप रंग आकार और कहाँ बैठी हैं इसके बारे में सब कुछ बताया है।जानते हैं सुरत (जीव आत्मा) किस तरह लगती है?

सुरत किस तरह लगती

Surt किस तरह लगती है?

Surat शब्द का अभ्यास नासिका के ऊपर दोनों भौवों (दोनों आंखों के मध्य भाग) के बीच में जो भृकुटी है उस जगह पर तीसरा नेत्र है। दोनों नेत्रों को बन्द करके अन्तरवृत्ति द्वारा जो तीसरे नेत्र में तिल है उसमें सुरत को एक टक जमाना चाहिए जिस तरह चकोर चन्दा को देखता है।

ठीक महापुरुषों की दया और उनके आशीर्वाद और अपने योग साधना से सूक्ष्म रूप में सुरत (जीवात्मा) का दर्शन दीदार कर सकते हैं।यह केवल महात्मा के आशीर्वाद और उनकी दया से ही संभव होता है।

अपनी आत्मा को कैसे देखे?

हमें क्या करना चाहिए

सुख आसन से बैठना चाहिए आलस्य निद्रा प्रमाद को कम रखना बहुत जरूरी है। भोजन सूक्ष्म कुछ भूख रखकर कम खाना चाहिए। असत्य भाषण कभी नहीं करना चाहिए। निन्दा और चुगुली से सदा बचना चाहिए। छल, कपट, दम्भ पाखण्ड से सदा दूर रहना चाहिये। परधन परनारि पर अपवाद से सदा दूर रहना चाहिये।

जो सदा सब प्राणियों की निन्दा करते और नाना प्रकार के दुर्व्यसनों में फंसे रहते हैं उनसे मेल-मिलाप कभी नहीं करना चाहिये। जिस कदर से अपने आप को श्री प्रभु ने शक्ति प्रदान कर रखी हो उसी के अनुसार सर्व प्राणियों की भलाई करने में तत्पर रहना चाहिये।

प्रयोजन से अधिक बचनों को भी नहीं बोलना चाहिये। जो सत्य और मधुरता से पूर्ण हो वही शब्द उच्चारण करना चाहिये। जो सत्य सिन्धु अनामी महाप्रभु की भक्ति करते हैं और अन्तरमुख अभ्यास में सदैव लगे रहते हैं उन्हीं प्राणियों से सतसंग व मेल मिलाप करना चाहिये।

अनहद शब्द सुनने का अभ्यास

भृकुटी में सुरत जमाने के साथ-साथ दाहिने कान में अनहद शब्द के सुनने का भी अभ्यास करना चाहिये।

जब महात्माओं के सत्संग में जाते हैं तो महात्मा सब कुछ बता देते हैं और हमारे लिए उस रास्ते को दे देते हैं जिस रास्ते से हम यह सब कुछ साक्षात्कार कर सकते हैं। केवल लेने मात्र से कुछ नहीं होता है करना यानी प्रैक्टिकल करना कि हमारा मुख्य कर्तव्य बनता है तब महात्मा बहुत खुश होते हैं।

निष्कर्ष

महानुभाव जब संत महात्माओं के चरणों में जाते हैं तो उनकी दया से हमारे कई जन्मों के पाप धुल जाते हैं ।उनके चरणों की रज लगाने से हमारा मस्तिष्क पवित्र हो जाता है और महात्माओं की अपार दया होती है।सच्चे हृदय से सब कुछ त्याग कर (काम क्रोध मोह लोभ अहंकार तमाम विकार) जाते हैं तो सुरत कैसी दिखती है यह सब पूछ महात्मा बताते हैं, महात्माओं के चरणों में जाना उच्च गति है। जय गुरुदेव मालिक आशीर्वाद सबको मिले।

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