Dooj Ka Chand दुइज का चाँद अंतर दृष्टि से कब और कैसा दिखता है?

दुइज का चाँद पर महात्माओं ने इसका उदाहरण दिया है। जब इंसान की उस महान प्रभु की कृपा से दिव्य दृष्टि खुलती है तो दरवाजे पर या आला मैं सबसे पहले क्या और कैसे दिखता है? महापुरुषों ने Dooj Ka Chand की चर्चा और वर्णन किया। साथ में श्री गुरु पद नख मनि गन ज्योति सुमिरत दिव्य दृष्टि होती इसका सम्बंध दूज के चांद से है। चलिए वहाँ पर सुने अपने सत्संग के माध्यम से क्या बताएँ जानते हैं। जय गुरुदेव

Dooj Ka Chand दुइज का चाँद
Dooj Ka Chand दुइज का चाँद

श्री गुरुपद नख मनि गन ज्योति

महापुरुष बताते हैं कि जब साधक अपनी साधना में लीन होता है और गुरु के चरणों से प्रीत व मंत्रमुग्ध होकर के, जब वह परमपिता परमेश्वर, या बताएँ गुरु के बताए हुए रास्ते पर ध्यान करता है। श्री गुरुपद नख मन गण ज्योति गुरु के चरणों से वह दया की धार निकलती है। नख का मतलब होता है नाखून जैसा चांद, या जिस तरह से दूज का चांद होता है। महात्माओं ने इसके बारे में विस्तार से बताया भी है चलिए जानते हैं सत्संग के माध्यम से,

Dooj ka chand (दुइज का चाँद)

कहते हैं वह शीशा क्या है? गुरु चरण। अरे भाई क्या? उसको स्मरण करो उसको देखो अन्तर दृष्टि से, दरवाजे पर बैठ करके देखो। भाई वह चमकता हुआ नजर आयेगा, समझ गये, गोस्वामी जी ने कहा है रामायण में। (dooj ka chand meaning) अच्छा, नख की क्या तारीफ है? आपने देखा होगा दुइज का चांद।

लोग जो हैं मुसलमान या अपने मजहबों में भी बड़ा शुभ माना जाता है और लोग जो हैं दुइज के दिन देखते हैं और उसको और अपना बड़ा भाग्य सराहते हैं तो दुइज का चाँद (Dooj ka chand) नख के समान रहता है। बिलकुल ठीक जैसा कि वह नाखून रहता है इसी तरह से गोलाकार छोटा-सा।

कहते हैं ठीक जब तुम्हारी थोड़ी-सी आँख खुलती है तब ठीक उसी तरह से वह नख नजर आता है। वह नख का वयान करते हैं गोस्वामी जी महाराज और जब। तुम्हारी दृष्टि मिलेगी तो पूरा खुल जायेगा और उसको कहतो हैं चांद। है आला शीशा देखने का।

दरवाजे पर बैठ Dooj ka chand Dekhe

तुम उसमें शकल देख सकते हो अच्छी तरह से और फिर उसी में होकर न मालुम कितनी शकलें देख लो। वह ऐसा उलटा है। जब तुम ऐसे देखे तो नीचे की सारी चीज दिखाई देती है। बिलकुल खुल्लम खुल्ला। क्या हो रहा है यहाँ? यह हो रहा है। भाई कौन क्या कर रहा है? भाई यह कर रहा है। उसी को क्या कहते हैं कि महात्मा अन्तर्यामी जाते हैं।

यह है वह आला जो तुम्हारे पास में भी है। लेकिन जब दरवाजे पर बैठ जाओ तो उसी में नजर आने लगे। पर, हमको बैठने का मौका कभी नहीं मिलता और गुरु भी ऐसा नहीं मिला कि आपको जोर देकर यहाँ बैठाता और यदि गुरु मिल जाय तो जरूर बैठायेगा इस पर।

वगैर इस काम को किये हुए आपको छोड़ नहीं सकता किसी तरह से, अगर आमिल गुरु है अनुभवी है तो और अगर अनुभवी नहीं है तो बड़े मुश्किल की बात है। बराबर कभी बात पर जोर उन महापुरुषो का रहा जिन्होंने बैठकर के गुरु के चरणों में अनुभव किया।

इसी का जोर देते हैं यह इसीलिए हर एक प्रेमी जो जिस महापुरुष रास्ता घट का, ले चुके हैं वह हर इतवार को साथ में बैठ करके, यहाँ रोयें। इधर (संसार) में रोने की जरूरत नहीं है। समझ गये, जवान से रोने से काम नहीं चलेगा। उस आत्मा से रोओ देखो कैसा काम होता है।

Dhyan me दृष्टि कैसे जमायें?

उस दरवाजे पर बैठो और उधर ही को देखो। हम लोग कैसे रोते हैं कि रोते हैं इधर आंसू गिरते हैं उधर और देखते हैं इधर। इसलिए रोते रहते हैं तो उधर वह दृष्टि खुलती नहीं जो अन्दर की है और रोना चाहिए उस दृष्टि की ओर जो अनदर में हैं। हम बाहर के चर्म नेत्रों से रोते रहते हैं और आंसू भी गिरते हैं पर उससे नहीं रोते। वजह यही रहती कि वह नख (Dooj ka chand) हमको मिलता नहीं है।

हम उस पर दृष्टि कैसे जमायें? वह चरण मिला नहीं हमें। दिव्य दृष्टि मुझमें आयेगी ही क्यों? देखो कितना मैं अच्छी तरह वयान करता हूँ। तो उसी चरण के सामने थोड़ी-सी कालिमा है। आँख बन्द करो, उस पर नख आयेगा दृष्टि को रोक करके खूब गौर से देखो उस पर, तो पूरा-पूरा खुल जायेगा।

कहते हैं कि समूह मणियों का प्रकाश है और इतना सफेद है, इतना सफेद है कि उसको वयान नहीं किया जा सकता। भाई, कहते हैं कि यहीं पर सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। यह है आत्म सिद्धि। इसको कहते हैं आत्म ताकत, आत्म-बल कहो। आत्म अनुभव कहो यहीं पर प्राप्त होता है।

एको अहम् द्वितीयो नास्ति

वही वह चरण है। यह वह चरण है कि जिन्होंने अनुभव किया होगा उन्होंने ते किसी और शब्दों में पुकारा लेकिन जो पढ़ते हैं वह कहते हैं “एको अहम् द्वितीयो नास्ति” समझ गये। नहीं भाई जो कुछ सृष्टि बनी है सब। कुछ तुम ही से बनी है। मुझ ही से सब कुछ उत्पन्न हुआ मैंने ही सबको पैदा किया मैं ही सब में हूँ, समाया हुआ हूँ।

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यह आत्म दृष्टि उन लोगों की है जिन्होंने अनुभव किया है वह कहते हैं सभी में ही तो समाया हुआ हूँ। मुझसे कोई चीज भिन्न नहीं है। लेकिन नहीं। किसी अनुभवी पुरुष ने कहा कि नहीं, आगे और चलो। तो क्या देखते हैं उसी तरह खिले हुए मण्डस थे लाखों अनन्तों बेशुमार खिले हुए। तो कहते हैं अरे भाई वहाँ तो मैंने एक देखा था एक चरण समूह था और मैंने देखा कि इस मण्डल पर लाखों और बेशुमार खिले हुए हैं।

निष्कर्ष:

ऊपर दिए गए आर्टिकल के अनुसार आपने Dooj Ka Chand दुइज का चाँद अंतर दृष्टि से कब और कैसा दिखता है? इसके बारे में आपने बाबा जयगुरुदेव सत्संग का अंश पढ़ा। आशा है आपको ऊपर दिया गया सत्संगा Post जरूर अच्छा लगा होगा। जय गुरुदेव,

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