गुरु भक्ति के लाभ क्या है? गुरु भक्ति से फायदा। Guru Bhakti Ke Labh

Jai Guru Dev महानुभाव, गुरु भक्ति के क्या लाभ है? Guru bhakti ke Labh से फायदा है? क्या हमारे संसारी और आध्यात्मिक जीवन में क्या फायदा होता है? वैसे देखा जाए तो गुरु भक्ति ही शिष्य के जीवन का असली सिंगार है। सतगुरु की उपस्थिति में लाभ लें, गुरु भक्ति (Guru Bhakti) योग बड़े ही नसीब वालों को प्राप्त होता है।

Guru बनाने से फायदा, गुरु भक्ति (Guru Bhakti) कैसे करने चाहिए? गुरु पूजा का महत्त्व, आदि तमाम जानकारियों को आप जय jaigurudev.co.in पर पड़ेंगे तो चलिए स्टार्ट करते हैं। इस सत्संग आर्टिकल के माध्यम से पड़ेंगे जो स्वामी जी महाराज ने सत्संग में लोगों के साथ साझा किया तो चलिए इस सत्संग पोस्ट को पूरा पढ़ें।

Guru Bhakti Ke Labh
Guru Bhakti Ke Labh

गुरु भक्ति के लाभ (Guru Bhakti Ke Labh)

Guru का दर्शन, गुरु की सेवा, गुरु की पूजा, Guru का ध्यान, गुरु की संगत, यह सब कुछ गुरु भक्ति के प्रकरण हैं। इनसे जगत के मोटे बन्धन कटेंगे। इसलिए पहली शर्त यह है कि मनुष्य गुरु की भक्ति में मन दे जिससे मोटी माया साफ हो जाय।

रही झीनी माया, इसके लिए गुरु के नाम का सुमिरन और ध्यान के अभ्यास की आवश्यकता है जिसका सम्बन्ध मन के साथ है। जब यह दोनों सीढ़ियाँ तय हो जायेंगीं तो अपने आपका साक्षात्कार होगा और मनुष्य जीवन मुक्ति के सुख का (Mnushya Jivan Mein Sukh) अनुभव करेगा।

जब स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकार की माया के संस्कार दूर हो जायेंगे तो फिर हर जगह इष्टदेव का रूप दिखाई देने लगेगा। यह रूहानियत है और यही रूप के सुख का असली स्थान (Sukh Ka Asali Esthan) है जिसके प्राप्त करने के सिवाय गुरु की भक्ति (Guru Ki Bhakti) के और कोई तरकीब नहीं है।

पात पात को सींचते, पेड़ को दिया सुखाय।
माली सींचे मूल को, ऋतु आया फल खाय॥

अनन्य भक्ति का अर्थ हैं (Anany Bhakti ka Arth)

अनन्य भक्ति (Anany Bhakti) का अर्थ हैं एक की भक्ति और वह एक। की भक्ति, गुरु की भक्ति (Guru Ki Bhakti) हो सकती है क्योंकि मन की भक्ति से यह जीव कभी ठौर ठिकाने नहीं लग सकता है। मन का तो स्वभाव है कि वह कभी एक जगह पर ठहरा नहीं करता।

सदा बन्दर के समान कभी कहीं और कभी कहीं उछलता कूदता हुआ अनेक सम्बन्ध अपने आस पास बनाये रखता है। इन सम्बन्धों से छूटने के लिए अकेली तदबीर यह है कि गुरु के रूप (Guru Ke Roop) से सम्बन्ध उत्पन्न किया जाय। उसी एक के रिश्ते से बाकी सम्पूर्ण रिश्ते आपसे आप कट जायेंगे।

कल्पनायें दूर होगी और जीव अपने ठिकाने लगेगा। बेसमझी की भक्ति किसी काम की नहीं होती है क्योंकि एक उपासक (Worshiper) हो और हजारों उसके इष्ट हों तो वह बिचारा किस-किस की पूजा करे और किस-किस के साथ प्रेम करे।

खुशी और आनन्द को प्राप्त करे (Khushi Aur Anand)

सुगम युक्ति यह है कि गुरु का पल्ला दृढ़ता से पकड़ ले अनेक का झगड़ा आप से आप मिट जायेगा। संसार में ही मनुष्य सुख और शान्ति (Khushi Aur Anand) को चाहता है। हर एक की इच्छा है कि उसका मन एकाग्र हो और वह एकता की व्यवस्था पर पहुँच कर सच्ची खुशी और आनन्द (Khushi Aur Anand) को प्राप्त करे।

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परन्तु यह एकता जब होगी, जब वह एक का बनेगा। एक का बनने से एकता (Unity) आयेगी और बहुतों का बनने से वृत्ति बिखरी रहेगी और सुख का स्थान नहीं मिलेगा। जो मनुष्य बहुतों का बनता है वह वास्तव में एक का भी नहीं बनता और जो एक का बन जाता है उसमें बहुतों का प्रश्न आप से आप पूर्ण हो जाता है।

सब आये उस एक से, उस एक से, डाल पात, फल-फूल।
अब कहो पीछे क्या रहा, गहि पकड़ा जब मूल॥

गुरु पूर्ण मिल जाने पर (Purn Guru Milane Par)

जिसको गुरु पूर्ण मिल जाने पर भी मन की शान्ति नहीं हुई तो इसका कारण यह है कि अभी मन से अनेक के सम्बन्ध का नुक्स दूर नहीं हुआ। गुरु के मिलने पर साथ ही यह शर्त भी जरूर है कि औरों के सम्बन्ध में कमी की जाय। क्योंकि जब तक अनेक की तरफ से दिल नहीं हटाया जाएगा तब तक एक की भक्ति का रस (Bhakti Ka Ras) नहीं आयेगा।

गुरू से करे कपट चतुराई। सो हँसा भव भरमें जाई॥
जो शिष्य गुरु की निन्दा करई। सूकर स्वान गरभ में परई॥

निष्कर्ष

महानुभाव ऊपर दिए गए सत्संग आर्टिकल के माध्यम से अपने गुरु भक्ति पर मिलने वाले लाभ के बारे में Guru Bhakti Ke Labh जाना। हमारे जीवन में गुरु भक्ति से क्या परिवर्तन होता है? यदि आप और हम सच्चे दिल से परम पिता परमेश्वर स्वरूप गुरुदेव को अपने सच्चे दिल से माने तो हमारे दिल में हमारे अंदर जो भाव पैदा होते हैं उसकी व्याख्या करना थोड़ा असंभव हो सकता है।

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क्योंकि जिसने गुरु भक्ति (Guru Bhakti) की और उस पर दया हुई, उस दया का स्वयं अपने मुख से बखान नहीं कर सकता है। महानुभाव गुरुदेव अपने इष्टदेव उन्हें सच्चे हृदय से अपने दिल में रखें मालिक आपकी देखरेख हमेशा करता रहता है। उसके बहुत लंबे हाथ हैं वह आपकी सारी मनोकामनाएँ, संसारी और आध्यात्मिक पूर्ण करेंगे। गुरु महाराज की दया सभी को प्राप्त हो, “जय गुरुदेव”

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