सत्संग केवल सुन लेने (Satsang Keval Sun Lene) का विषय ही नहीं अपतू अपने प्रत्यक्ष जीवन में उतारें

जय गुरुदेव महानुभाव, इस सत्संग आर्टिकल के माध्यम से आप जानेंगे कि महापुरुष सद्गुरु स्वामी जी महाराज “जय गुरुदेव जी” ने सत्संग के बारे में क्या कहा? Satsang Keval Sun Lene Ka Vishy Hi Nahi, सत्संग के मूल अर्थ को समझने को कहा, सत्संग केवल सुन लेने का विषय ही नहीं अपतू अपने जीवन में प्रत्यक्ष उतारें, तभी सत्संग का प्रभाव हमारे जीवन में साकार हो सकता है। आइए जानें,

सत्संग केवल सुन लेने (Satsang Keval Sun Lene Ka Vishy Hi Nahi)

जब भी सत्संग में लोग जाते आते हैं तो एकाग्र चित्त होकर यदि महापुरुषों की अमृतवाणी को नहीं सुना और व्यर्थ में समय गमाया।इससे क्या होने वाला है? वैसे सत्संग केवल सुन लेने से ही सारा काम नहीं होता है (Satsang Keval Sun Lene Ka Vishy Hi Nahi) हमें अपने जब तक जीवन में नहीं उतारेंगे, जब तक हम प्रैक्टिकल नहीं करेंगे तब तक सत्संग का पूर्ण लाभ नहीं मिलेगा।महापुरुषों के दर्शन से ही बहुत कुछ प्राप्त हो जाता है।

Satsang Keval Sun Lene Ka Vishy Hi Nahi

सच्चे मार्ग के जानने की चेष्टा (Sachha Marg Jane)

हम अपने उन महापुरूषों के आदर्श व परा विद्या को बिल्कुल भूल गये हैं तथा भूलते जा रहे हैं जिसे प्राप्त करके हमारा दुख व क्लेश के बन्धन से छुटकारा हो जाता था। मन इन्द्रियों के घाट पर बैठ कर हम विषयों का आनन्द लेने लगे तथा परम पिता को जिसके बूंद रूप अंश से हम पैदा हुए सदैव के लिए भुला दिया।

उस प्रभू को प्राप्त करने की तथा उसको प्राप्त करने के सच्चे मार्ग के जानने की हमने न कभी चेष्टा की न किसी संत महात्मा के बताये हुए वाणी व बचनों पर भी उचित रीति से ध्यान दिया। फिर सुख और शान्ति मिले तो कैसे मिले असत्य वस्तुओं के रस से हमें न कभी सुख व शान्ति प्राप्त हुई है न होगी।

हमें तो उन महान आदर्श पराविद्या को जानने की अतीव आवश्यकता है। धार्मिक पुस्तक के पठन-पाठन से ही हम समझ बैठते हैं कि हम ने बहुत जान लिया जिससे कि हम व्यर्थ के वाद विवाद में पड़ते तथा आवश्यक अहंकार मोल ले लेते हैं।

पुस्तकों के ज्ञान से ही ज्ञान पूरा नहीं होता (Books Gyan)

भाइयों, पुस्तकों के ज्ञान से ही ज्ञान पूरा नहीं होता न उसकी लिखी बातें ठीक-ठीक समझ में आ सकती हैं जब तक कि कोई अनुभवी महात्मा हमें उनका ठीक-ठीक अनुभव न करा दें।

अतएव यह परमावश्यक है कि हम उन धार्मिक ग्रन्थों तथा पुस्तकों के ज्ञान का तत्व रूप समझ लें और प्रत्यक्ष अनुभव कर लें जिससे कि हम अपना कल्याण कर सकें एवं साथ ही साथ समाज को भी सुखी बनाकर सतयुग का आनन्द प्राप्त करें।

महान पुरूषों की पराविद्या प्राप्त करो (Paravidhya Prapt Karo)

अतएव भाइयों। उन महान पुरूषों की पराविद्या प्राप्त करो जिससे कि सरल योग द्वारा अपने को जान सकते हो। तुम्हारे अन्दर भी वैसे ही परम पिता का एक बेतार का तार लगा है जिससे हम देश विदेश की सूचनायें घर बैठे प्राप्त किया करते हैं।

सुरत शब्द के योग से सारे जीवन का रहस्य विदित हो जाता है। तुम भी इस योग से सारे आकाश वाणियों द्वारा एक दूसरे महान पुरूषों से बात चीत कर सकते हो। इस अमूल्य विद्या को शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त करो अन्यथा यह मनुष्य शरीर बेकार ही चला जाएगा।

इस अमूल्य शरीर की प्राप्ति फिर-फिर नहीं होगी व चौरासी लाख योनियों में जाकर नाना प्रकार के पीड़ाओं की ताप सहनी पड़ेगी फिर इस दुख से कौन तुमको बचाएगा। मनुष्य जीवन का ध्येय यह होना चाहिए कि जीते जी अपने प्रभु की प्राप्ति कर लें और काल के असह् दुख से सर्वदा के लिए छुटकारा पा जाय।

पराविद्या कैसे जान सकोगे (Paravidhya Kaise Jane)

क्या तुमने कभी सोचा है कि हम मर कर कहाँ जायेंगे? और हमारी क्या दशा होगी? अपराध करके यदि तुम अपने को निरपराध प्रमाणित करोगे तो यम की पुलिस क सामने जब कि वे तुम्हें पकड़ ले जायेंगे तो क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम्हें दण्ड न मिलेगा।

तुम जो कुछ भी बात बनाओगे अपनी सारी अपरा विद्या के आधार पर ही तो बनाओगे फिर पराविद्या कैसे जान सकोगे और नर्क के महान क्लेशों से तुम्हारा छुटकारा कैसे हो सकेगा?

आत्मा का अनुभव नहीं किया (Aatma Ka Anubhao)

आत्म ज्ञान के आधार पर बहुत लोग उपदेश करते हैं परन्तु साधक व्यक्ति दुष्प्राप्य होते हैं। मौखिक कथावार्ता भाषण कीर्तन आदि की प्रथा जिसका सतसंग के मिथ्या नाम से प्रचार किया जा रहा है अधिक प्रचलित हो गई किन्तु वहाँ आत्म सुख का प्रवाह शून्य रहता है।

संत श्रेणी के महात्मा ही सतसंग के सच्चे स्वामी होते हैं। वही नाम धनराशि दे सकते हैं उनके नेत्रों में उनके दर्शन में तथा रोम-रोम अक्षर-अक्षर में प्रभाव होता है। वह हर एक को बैठाकर थोड़ा बहुत प्रत्यक्ष अनुभव करा सकते हैं। जिसने अपनी आत्मा का अनुभव नहीं किया,

पिण्ड और अण्ड को नहीं छोड़ा, मन इन्द्रियों के बन्धन से मुक्त नहीं हुआ वह तो लोगों को पुस्तकों से ही उपदेश दे सकता है फिर परिणाम क्या हुआ। सोये हुए को सोया कैसे जगा सकता है।

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चेतन शक्ति से स्थायी सम्बन्ध (Chetan Sakti Se)

यदि चेतन शक्ति से सम्बन्ध किया होता तो चेतन शक्ति से स्थायी सम्बन्ध जुट सकता था। यह सब देखते हुए मेरे भी हृदय में प्रेरणा हुई कि श्री स्वामी जी महाराज जी के स्थूल शरीर गुप्त होने के पश्चात जो सतसंग जिसे वास्तव में यथार्थ सतसंग कहा जा सकता है

भूल भ्रम में पड़े हुए भाइयों के समक्ष रखू। मैंने तो स्वामी जी के चरणों में रह कर एक मादक की भांति छक-छक कर आसव पान किया है। वह मादकता मुझ पर ऐसी चढ़ी हुई है जो उतारे उतर नहीं सकती। मैं समाज के भेद भाव को भूलकर अपने प्याले को हाथ से आगे बढ़ाकर अपने सभी जनों के मुख से लगा देना चाहता हूँ कि वे भी पान कर इस रस को चखें व देखें तो कि कैसी मादकता है।

मेरी हार्दिक इच्छा थी कि सतसंग के इन अमूल्य वचनों को एकत्रित कर उन्हें प्रकाशित करूं जिससे कि सत्य के खोजी जनों को महान पुरूषों की महिमा व वाणियों का यथार्थ तत्व भलीभांति समझ में आ जावे। वे सतसंग को केवल सुन लेने का विषय ही न (Satsang Keval Sun Lene Ka Vishy Hi Nahi) समझें अपितु जीवन में उसकी प्रत्यक्ष प्राप्ति करें। यदि मेरी यह भावना सफल हुई तो मैं अपने आपको भाग्यशाली समझूगा।

निष्कर्ष

महानुभाव ऊपर दिए गए सत्संग आर्टिकल के माध्यम से आपने यह जाना कि Satsang Keval Sun Lene Ka Vishy Hi Nahi स्वामी जी महाराज ने अपने सत्संग प्रेमियों से क्या कहा? अपने शिष्यों को क्या उपदेश दिया? सत्संग के महत्त्व को समझाया है। आशा है आपको ऊपर दिया गया सत्संग आर्टिकल बहुत अच्छा लगा होगा। जय गुरुदेव “स्वामी जी महाराज की दया सब पर बनी रहे”

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