गुरु वचनों को (Guru Vachno Ko) रखना संभाल के आगे नहीं मिलेंगे, जाने के बाद

जो दौलत मिल रही है आगे नहीं मिलेगी गुरु के जाने के बाद, गुरु वचनों को (Guru Vachno Ko) रखना संभाल के आगे नहीं मिलेंगे, गुरु सरूपी परमात्मा हमारी तरफ देख रहा है। गुरु महाराज ने कहा भी था कि जो दौलत मिल रही है आगे नहीं मिलेगी, गुरु के जाने के बाद हम पीछे रह जाते हैं। जब अशांति फैलती है तो उसका भौतिक इलाज नहीं होता है। गुरु के वचनों (Guru Vachno Ko) को नहीं मानते इसलिए हम परेशान होते हैं। चलिए स्वामी जी महाराज का सत्संग पढ़ते हैं पूरा पढ़ें जय गुरुदेव

गुरु वचनों को (Guru Vachno Ko) रखना संभाल के
गुरु वचनों को (Guru Vachno Ko) रखना संभाल के

गुरु वचनों को रखना संभाल के (Guru Vachano Ko Rakhna)

प्रेमियों जब तक हमारे जीवन है तब तक हम सब कुछ कर सकते हैं। जब यह शरीर नष्ट हो जाएगा हम कुछ भी नहीं कर पाएंगे। इसलिए महात्मा हमेशा यही कहते हैं कि गुरु के वचनों को हमेशा संभाल के रखना चाहिए, क्योंकि गुरु के दिए हुए वचन हमारे जीवन में मिथ्या नहीं जाते हैं।

हमारे जीवन को सफल बनाते हैं हमें परमात्मा से प्राप्त करने में मदद करते हैं। यदि हमने जीवन में गुरु के दिए हुए वचनों (Guru Vachno) का पालन किया तो हमारे मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य पूरा हो जाएगा।

संत कितनी तकलीफ उठा रही है तुम्हें इसका अनुभव नहीं है यदि आज गुरु के वचनों की माला तुमने पहन ली होती तो आज कितने इसमें तैयार हो जाते और गुरु का काम करते। पराविद्या वह है जो दोनों आँखों के ऊपर है जो तीसरी शिवनेत्र दृष्टि से देखी जाती है। उस आँख से देखा जाता है वह चैतन्य है जड़ नहीं।

गुरु तुम्हारी तरफ देख रहे

तमाम संगत का संकेत करते हुए स्त्री व पुरूषों को समझाकर कहता हूँ कि आपको यहाँ आकर सोना नहीं है और न आँखें बन्द करके सुनना है। आँखें खोलो कान इनके बचनों के तरफ लगाओ और अपनी आँखों से इनकी आँखों की तरफ देखो चाहे वह न देखें परन्तु तुम यह समझ कर देखो कि गुरु तुम्हारी तरफ देख रहे हैं। इनकी आँखों में तरावट है।

दया की भरी आंखें सतसंग के समय हुआ करती है। उसी वक्त तुम्हारी सुरत साफ हो जायेगी और वक्त साधन के तुम्हारी रुह ऊपर को जायेगी। तुम्हें गुरु के ऊपर आशिक इस तरह हो जाना चाहिए जैसे कि एक पतंगा दीपक पर आशिक हो जाता है दीपक को देखते ही।

सिनेमा के लिए जोरदार शब्दों में कहा कि गुरु की आज्ञा नहीं है कि सिनेमा देखा जाय। वह लोग गुरु के चिन्हों पर दाग लगाते हैं जो सिनेमा देखने जाते हैं शराब और मांस खा लेते है और गुरु से नाम भी ले चुके हैं गुरु को बदनाम करते हैं। उनका भला कैसे होगा जो गुरु के ऊपर आक्षेप अपने कुकर्मो से लगा रहे हैं गुरु के शिष्य नामदान लेने वाले अपने को कहते हैं।

गुरु के जाने के बाद

जिन लोगों ने नाम ले लिया है, वह सतसंगी नहीं हैं। सतसंग में प्रवेश हुये हैं पर उन्होंने जीव हत्याये की हैं गोश्त सदा खाकर, नाम लेने के बाद उनकी सजा क्या होगी। गुरु के रहते हुए गुरु अपने शब्दों से दवा देता है। पर गुरु के जाने के बाद संगत यह कहती है कि गुरु ने मना नहीं किया था इसलिए फला शक्स नाम लेकर गुरु का शिष्य कहलाता हुआ मांस शराब पीता रहा।

गुरु का जो नाम लेते हैं पापी हैं। मैं सब जगह महराज जी का नाम लेते हुए शिष्यों से सुनता हूँ। जो कोई पूछता है कि आपके गुरु का नाम क्या है? शीघ्र उत्तर दिया कृपाल सिंह ऐसे नाम लेने वाले लोगों की जबान कट जाना चाहिए। जब स्त्री पति का नाम नहीं लेती तब शिष्य को भी गुरु का नाम नहीं लेना चाहिए,

क्योंकि पति और पत्नी का यह भी मार्ग है। जो लोग गुरु का नाम लेते हैं उन्हें दूर से प्रणाम करना चाहिए बेअदब और कम्बख्त हैं जो गुरु का नाम लेते हैं। जो नाम रखा है उसे नहीं लेते जमाल और कमाल। सन्त जी के शिष्यों से स्वामी जी ने अपील की। कहा यदि वह नाम लेते हैं तो लें पर शिष्यों को कदापि नहीं लेना चाहिये। नाम लेने वाले कभी भी रास्ते छोड़ सकते हैं मेरा निजी विचार है।

दौलत मिल रही है वह आगे न मिलेगी

मैंने जोरदार शब्दों में कहा कि आपको जो दौलत मिल रही है वह आगे न मिलेगी क्या आप चुस्त चालाक नहीं हैं। गाफिली में पड़े और यह नहीं जानते हैं कि महापुरूष की। दौलत, नाम रूपी धन नहीं रक्खा जा सकता। वह धन उन्हीं के पास पहुँच जाता है। जो समय आज आपको उपलब्ध है वह फिर नहीं मिलेगा।

अन्त में फिर उन्हीं बातों की याद दिलाते हुए यह कहा कि आप अचेत है। वह काम करके जल्दी चले जायेंगें पीछे आपको पछताना होगा। इनको भी यहाँ नहीं रहना है। तुम सब जल्दी फायदा उठा लो। अपने जीवन को प्रेममय बनाओ।

प्रेम में झगड़े नहीं रहते हैं और यह स्वामी जी ने संकेत दिया है कि बाबा सावन सिंह जी के बचन न मानने पर कितने लोग शराब मांस खाने लगे ऐसा ही यहाँ भी हो सकता है और होगा। क्योंकि बहुत से लोग, अण्डा मांस, शराब बतौर टानिक के लेते हैं।

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बचन नहीं मानने पर और गुरु को सिर पर न रखने में सेवक कभी अपने गुरु के आदर्श से गिरता है। संत जी ने नाम लेने वाले लोगों को यह कहते हुये पुष्टि किया कि स्वामी जी ने जो कहा है सत्य है। नाम लेने के पूर्व आँखों में आँसू के आना चाहिए अन्दर में प्यार हो। वह जो नाम लेते हैं वे शिष्य नहीं है। बल्कि सतसंग में शामिल किए जा रहे कि रहनी गहनी सीखें। इत्यादि बचनों की पुष्टि करते हुए संत जी ने अपने प्रेमियों को कहा कि तुम्हारे आदर्श हैं तुम्हारी बदनामी से गुरु की बदनामी है।

अशान्ति जो फैली उसका भौतिक इलाज नहीं

मैंने यह भी पुष्टि के साथ कहा कि देश में अशान्ति जो फैली उसका इलाज भौतिक साधनों से सम्भव नहीं बल्कि यह स्कूल जो आज लगा है जिसमें करीब 7 हजार आदमी स्त्री पुरूष उपस्थित हैं, यही शाक्ति का केन्द्र है। जब कभी देश में अशान्ति आई, तभी सब महापुरुषों की शरण लोगों ने ली और लोगों को अलौकिक शांति मिली।

राजा दुःखी प्रजा दुःखी, कर्मचारी चपरासी सभी देश विदेश दुखी तथा अशान्त है। सभी को स्वामी जी ने बहुत सुन्दर तरीके से समझाया और सान्त्वना देते हुए प्रेम पर तथा गुरु वाक्यों पर जोर दिया। उनका वचन सुनों और जो वह कहें उसको मानो।

जो दरिया आज रूहानी बहती है वह भी बहना बन्द हो जायेगी। यह भी चले जायेंगें और तुम लोग अन्धेरे में रह जाओगे क्योंकि यह हमेशा ऐसा उपदेश नहीं करते रहेंगे इनका भी नाम रूप बदल जायेगा।

सावन आश्रम में कुछ लोगों की

सावन आश्रम में कुछ लोगों की पुरानी आदत बन चुकी है फौरन यह जाहिर करने के लिए कि हम बहुत प्रेमी है उबल पड़ते हैं और लोगों को दिखाने लगते हैं कि हम प्रेमी हैं। हम में बहुत प्रेम है। महाराज जी ने सतसंग में कहा था कि क्रोध मत करना। अन्दर ही अन्दर रोना, क्रोध छोड़ना और महराज जी के बचनों पर समर्पित होना आसान बात नहीं है देखा करते हैं। यदि साफ कह दिया जावे तब तो उनका टिकना मुश्किल होगा।

सतसंगी गुरु की प्रतिष्ठा का पूरा ध्यान रखें उनके पास रहता हुआ सेवक वह कर्म व आचरण नहीं करेगा जो गुरु आदेश देता है तब तो यह सत्य है कि वह सेवक है ही नहीं बल्कि गुरु के गुणों से बहुत दूर रहेगा। जैसे गाय के थन में किलोरी तथा छोटा कीड़ा लगा हुआ खून पीता है और बच्चा जो है उसका दूध पीता है।

दोनों में बहुत अन्तर है क्योंकि सेवक जो में सच्चा है उसे समझना चाहिए कि हमारे गुरु ने किसी में होकर उपदेश दिला दिया यह गुरु की दया है। हम सो रहे थे। गुरु का शुकराना न करते हुए बहुत से लोगों ने मुझ से कहा आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए। हम आप से बहुत गुस्से में हैं। सतसंगी जनों को समझाया कि हमने जो कुछ कहा अदब और सन्तों तथा गुरूओं की प्रतिष्ठा के हेतु कहा और होना भी चाहिये।

गुरु वचन को (Guru Vachno Ko) नहीं मानते

प्रथम तो महराज जी का हुकुम था। उनके हुकुम को मानते हुए आश्रम के वासी दूसरों का तिरस्कार करते हैं मुझे यह देखकर कष्ट हुआ और प्रार्थना करता हूँ कि वह कोई ऐसा आदर्श पेश न करें ताकि गुरु की शिक्षा पर आरोप आवे गुरु सर्वदा निर्दोष हैं। दोषी वही होंगे जो लोग गुरु वचन को नहीं मानते हैं।

वही दोषी और दिखावटी हैं। बीबी जी ने मुझे बुलाकर कहा के माफ करना बच्चे हैं। वह जानती नहीं हैं। बीबी को चाहिए कि वह खुद उसे समझातीं। मैं खुद इतना समझता हूँ और आश्रमवासियों को समझना चाहिये। मुझे क्या है मैं तो सबका अदब करता हूँ और करता रहूँगा। सतसंगी का आदर्श बहुत ऊँचा है। गुरु आदर्श के समान सतसंगी का आदर्श होना चाहिये।

निष्कर्ष

महानुभाव ऊपर दिए गए कंटेंट के माध्यम से हमने यह जाना कि गुरु वचनों को (Guru Vachno Ko) रखना संभाल के आगे नहीं मिलेंगे। गुरु के वचनों को यदि संभाल के रख लिया तो वह हमारे जीवन में काम आने वाले हैं। मिथ्या नहीं होते हैं। महात्मा अपने रहते नाम धन की दौलत बांटते हैं जो उनके जाने के बाद नहीं मिलेगी। आशा है ऊपर दिया गया कंटेंट जरूर अच्छा लगा होगा। मालिक की दया सबको प्राप्त हो, जय गुरुदेव।

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