Baba Jai Guru Dev Uddeshya In Hindi-बाबाजी का उद्देश्य

Uddeshya In Hindi बाबाजी का असली उद्देश्य क्या है? इस मानव जाति के लिए, अपने संपूर्ण जीवन कार्यकाल में जय गुरुदेव जी महाराज ने इस मानव जाति के प्रति क्या उद्देश्य रहा है? इस सत्संग आर्टिकल के माध्यम से जानेंगे। बाबाजी का मुख्य (Uddeshya In Hindi) क्या है? चलिए जानते हैं पूरा पढ़े यह बहुत ही जानने योग्य है तो चलिए शुरू करें, जय गुरुदेव।

उद्देश्य का अर्थ और परिभाषा (Uddeshya Meaning In Hindi)

सबसे पहले मैं उद्देश्य पर बात करने वाला हूँ। जो हम आप एक सरल भाषा में इसका अर्थ व परिभाषा (Meaning and Definition) जानते हैं। Uddeshya का मतलब (Example) होता है मकसद भी, Objective भी कह सकते हैं, या संकेत किए जाने योग्य कोई योग्य विचार, अभिप्राय या कोई खास प्रयोजन उद्देश (Uddeshya) है। हम एक लक्ष्य टारगेट भी कह सकते हैं जो पूर्ण रूप से करने के लिए अग्रसर अपना लक्ष्य निर्धारित करें। उद्देश एक मकसद को लेकर के अपने कार्यकाल में निरंतर प्रयास रत्न रहने का विचार और लक्ष्य है। तो मैंने अपनी भाषा में उपदेश का अर्थ (Uddeshya Meaning In Hindi) बताने की पूरी कोशिश की, अब हम जानते हैं बाबा Jai Gurudev Ka Uddeshya Kya है? चलिए आगे पढ़े।

बाबाजी Jai Guru Dev का उद्देश्य क्या?

Baba Jai Guru Dev Uddeshya In Hindi
Baba Jai Guru Dev Uddeshya In Hindi

प्राय: लोग यह प्रश्न करते है कि बाबाजी का उद्देश्य क्या है? यद्यपि बाबाजी अपने प्रत्येक सत्संग वचन में अपने उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से बताते रहते है फिर भी उन पर प्रकाश डालना आवश्यक है। बाबाजी का उद्देश्य (Uddeshya) शुद्ध परमार्थ है।

परमार्थ अर्थात् जीवन का परम अर्थ, परम लक्ष्य (Ultimate Aim) परमात्मा की प्राप्ति है। यह केवल मानव शरीर में ही संभव है क्योंकि इसी शरीर में मोक्ष का द्वार है और इसी शरीर से साधना की जा सकती है। इसी शरीर में आत्मा को जगाकर परमात्मा के पास पहुँचाया जा सकता है।

क्या बिना गुरु की साधना Jeevan Ka Uddeshya पूरा होगा?

इसके लिए सिद्ध सन्त, कामिल मुर्शिद अर्थात् सतगुरू की जरूरत है। बिना गुरु का सहारा लिये हुए कोई साधना (Jeevan Ka Uddeshya) कर ही नहीं सकता है। गुरु वह है जो मनुष्य शरीर में प्रगट होकर आत्मज्ञान और प्रभु प्राप्ति का मार्ग बताये। गुरु कोई लाल-पीला कपड़ा नहीं, जटा-जूट नहीं, छापा तिलक नाम नहीं, पढ़ाई लिखाई नहीं, नाच गाना, ढोल मजीरा नहीं।

गुरु वह ज्ञान है जो जीते जी प्रभु को पाने का मार्ग बताता है। उस मार्ग पर ले चलता है, मदद करता है। Guru वह शक्ति है जब तक वह आत्माओं को उनके घर यानी निज धाम अर्थात् परमात्मा के पास नहीं पहुँचा देता, तब तक आत्मा की डोरी नहीं छोड़ता। शरीर बदल जायेगा पर वह गुरु शक्ति आत्मा की सम्हाल करती रहेगी। तभी गुरु वाणी में कहा गया है:-मेरा भरता बड़ा विवेकी, आपे सन्त कहावे।

संत कबीरदास जी ने कहा (Sant Kabir Ne Kaha) :-

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दियो लखाय॥

इस आत्मा का कल्याण Kaise होगा?

जब ऐसे गुरु की प्राप्ति होगी तभी इस आत्मा का कल्याण होगा। यह आत्मा रूह, एक ही है दो नहीं। भाषा अपनी-अपनी है। सन्तों ने इसे है। जब से सुरत परमात्मा से अलग हुई वापस अपने घर अभी तक नहीं लौटी। वह यहाँ जड़ माया में फंसकर कर्मों के चक्कर में पड़ गई। वह जन्मती है। मरती है अपना खोल बदलती रहती है।

वह चेतन है। चौरासी लाख योनियों में भटकती सुरत कहा रहती है। नरकों में पिटती है। उसका कोई मददगार नहीं। जब चौरासी का चक्कर समाप्त कर पुन: मनुष्य शरीर (Human Body) में आती है तो फिर उसी सांसारिक वासनाओं में पड जाती है और आई थी छूटने के लिए पर अज्ञानता में फिर जिधर से आई थी उधर ही में चली जाती है पिटने के लिये चौरासी लाख योनियों में, कैदखाने में नकों की असहाय वेदना में।

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी (Ramcharitmanas Goswami Tulsidas) महाराज ने साफ लिखा है-

जो न तरै भवसागर, नर समाज अस पाय।
सो कृत निन्दक, मन्दमति, आत्माहन गति जाय॥

बाबाजी JAI GURU DEV कट्टर धार्मिक पुरूष हैं।

धर्म (Religion) कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं है, मन्दिर मस्जिद विवाद नहीं, हत्या कत्ल गोली बारूद नहीं, चुनावी मुद्दा नहीं, भाषणों का प्रकरण नहीं है। धर्म जीवन को नियंत्रित करने की रेखा है, आत्मा को जगाने की एक कड़ी है। धर्म धारण किया जाता है। धर्म लोक परलोक को जोड़ने की एक कड़ी है। परमार्थ की जमीन धर्म की नींव है। धर्म तो किसी ने किसी रूप में मानव जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है और मृत्यु पर्यन्त चलता है।

सभी महापुरूषों का जो उद्देश्य (MahaPurusho Ka Uddeshy) रहा वही बाबाजी का भी Uddeshya है। दिव्य दृष्टि, ज्ञान चक्षु, तीसरी आँख, सिस्त की चर्चा सभी महापुरूषों ने की है, भाषा अपनी-अपनी है। बाबाजी तो उसका स्पष्ट प्रचार ही करते है। धर्म के प्रचार में कोई जाति सीमा नहीं, समाज सीमा नहीं, आयु सीमा नहीं। बाबाजी के पास हर वर्ग के लोग हैं और परमार्थ की तरफ कदम बढ़ा रहे है। उनकी संख्या करोड़ों में है।

जाति पांति पूछे नहिं कोई। हरि को भजे सो हरि का होई॥

बाबा Jai Gurudev जी बराबर कहते है कि:-

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साधू जाति की बात उठायेगा तो वह जीवों का कल्याण नहीं कर सकता, राजा जाति की बात करेगा तो वह सबको न्याय, सुरक्षा नहीं दे सकता। इसके साथ ही राज्य में संघर्ष हो जायेगा। डाक्टर जाति की बात करेगा तो सबका रोग निदान नहीं कर सकता है। इसी प्रकार परमार्थ का खोजी जाति देखकर गुरु धारण नहीं करता। उसे तो सच्चाई मिलनी चाहिए।

निष्कर्ष

ऊपर दिए गए कंटेंट के माध्यम से हमने बाबा जयगुरुदेव जी महाराज का उद्देश्य समझा (Baba Jai Guru Dev Uddeshya In Hindi) कहीं-कहीं मैंने “उद्देश्य है” जैसे शब्द का प्रयोग किया मेरा लिखने का उद्देश्य यही है कि आज भी है, कल भी रहेंगे, बाबाजी हैं, शब्द रूपी गुरु हमेशा साथ रहता है। जय गुरुदेव

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