Jai Guru Dev जी का परिचय, नामदान और परमात्मा की खोज

Jai Guru Dev: महानुभाव आप जानेंगे बाबा जयगुरुदेव जी महाराज (Baba Jai Guru Dev Ji Mahraj) का परिचय, नामदान और परमात्मा की खोज उन्होंने क्या और कैसे की? कहाँ से नामदान प्राप्त किया और कैसे वह परमात्मा की खोज में कहां-कहाँ भट्टके? कौन-कौन से उन्होंने जीते जी परमात्मा पाने के लिए प्रयास किए, किन-किन आश्रमों में गए और बाबा jai guru dev जी के गुरु कैसे मिले? उनके गुरु कौन हैं? बाबा जयगुरुदेव जी का जीवन कहानी या यूं कहें कि पूरा परिचय (Jai Gurudev Biography In Hindi) आपको इस आर्टिकल से मिलने वाला है। आप इस सत्संग आर्टिकल को पूरा पढ़ें यह बाबा जय गुरु देव जी की जीवनी के रूप में लिखा जा रहा है। तो चलिए जानते हैं बाबा जी का परिचय नामदान और परमात्मा प्राप्ति के बारे में,

Jai Guru Dev Photo
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बाबा जय गुरु देव जी का परिचय (Baba Jai Guru Dev Ji ka Parichay)

भारत के प्रान्त उ0प्र0 के जिला इटावा के रिवतौरा ग्राम में बाबा जय गुरूदेव जी का जन्म हुआ था। माता-पिता ने उनका नाम ‘तुलसीदास’ रखा था। बाल्य अवस्था में ही माता-पिता परलोक सिधार गए। बाबा जी के शब्दों में-‘ मैं छोटा था। मुझे याद है कि मेरी माता जी ने मुझसे कहा था कि बेटे शादी मत करना, परमात्मा को प्राप्त करना। मेरी ये दो बातें याद रखना।

बाबा जी की एक नामदानी शिष्या थीं श्याम बाई उर्फ जशेदा मैया। उन्होने बाबा (Jai Guru Dev) जी को पुत्र रूप में माना था और अपने उप नाम के अनुसार बाबा जी उनके लिए किशन’ थे। वह इसी नाम से बाबा जी को पुकारती थीं। अपने अन्तिम दिनों में वह चिरौली सन्त आश्रम, कृष्णानगर मथुरा में आकर रहने लगी थीं।

जय गुरूदेव पुराने आश्रम (Jai Guru Dev Purana Ashram)

यह आश्रम बाबा जी के पुराने आश्रम (Ashram) के रूप में जाना जाता है जहाँ प्रारम्भ के कई वार्षिक भण्डारे हुए हैं। जब भीड़ की वजह से जगह छोटी पड़ने लगी, तब बाबा जी ने आगरा-दिल्ली बाइपास पर आश्रम (Agra Delhi Bypass Jay Gurudev Aashram Mathura) बनवाया जहाँ नाम योग साधना मन्दिर (Naam Yog Sadhna Mandir) है जो आज कल Mathura Mein आकर्षक का केन्द्र बना हुआ है।

जब जशोदा मैया का शरीर शान्त हुआ वह बाबा जी ने उन्हें अपना कन्धा दिया और मुखाग्रि दी थी। कुछ लोगों ने बाबा जी को जब नीति सिखाई थी कि आप साधु हैं, कन्धा मत दीजिए। बाबा जी ने जवाब दिया था कि उसने मुझे अपना बेटा माना था। बेटा होने के नाते मेरा कर्तव्य है कि माँ को कन्धा दूं। यह सुनकर सब नत मस्तक हो गए।

Baba Jai Guru Dev जी को माँ के वाक्य

बाबा जयगुरुदेव जी महाराज की माता जी ने कहा जो उनके लिए माँ के अन्तिम वाक्य प्रेरणा श्रोत बन चुके थे और वे अल्पायु में ही परमात्मा की खोज (Parmatma Ki Khoj) में निकल पड़े। जितने मजहब, धार्मिक सम्प्रदाय, साधू महात्मा, पीर-फकीर, औलिया मिले सबका दरवाजा खटखटाया। तरह-तरह की छोटी-बड़ी सेवायें की। किसलिए?

Jai Guru Dev Image
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“कोई आन मिलावे मेरा प्रीतम प्यारा”

परमात्मा की खोज (Parmatma Ki Khoj) और लगन में कब बचपन निकल गया, कब किशोरावस्था निकल गई, कब युवावस्था आई कुछ होश ही नहीं रहा पर खोज (Khoj) जारी रही। आखीर में निराशा होने लगी। मानव जीवन बेकार लगने लगा, जिन्दगी भार बन गई।

अन्तत: जब बाबा Jai Guru Dev जी ने जिन्दगी को अलविदा कहने की ठानी, तो एक प्यार भरा हाथ उनके कंधों पर पड़ा और आवाज आई कि बस, थोड़ी-सी और खोज कर लो, मंजिल मिलने वाली है। फिर बाबा जी में एक प्रेरणा जाग उठी और फिर वह पूरे जोश के साथ चल पड़े उस महापुरूष की तलाश में जो उन्हें प्रभु का दर्शन करा सके।

बाबा जय गुरुदेव जी के गुरु (Baba Jaigurudev ji ke Guru)

खोज की तपस्या पूरी हई और बाबाजीको वह महान हस्ती मिली अलीगढ़ जिले के छोटे से गाँव चिरौली में एक साधारण ब्राह्मण परिवार के पण्डित घुरेलाल जी शर्मा के रूप में Guru Mil Gaye. सादा सरल जीवन था गुरूजी का लेकिन परमार्थ के धनी थे। बाबाजी ने सामने अपनी मंजिल देखी तो वाणी अवरूद्ध हो गई, आंखें छलकने लगी।

ये वही महापुरूष थे जिन्होने निराशा के अन्धकार में आशा की किरण जगाई थी। अब कहने सुनने को क्या रहा औश्र चरणों में झुक गए। ‘गुरू भी दुर्लभ, चेला दुर्लभ, बड़े भाग्य से मेल मिला।’ गुरु जी भाव विभोर थे ऐसे शिष्य को देखकर और शिष्य? वह तो धन्य-धन्य हो रहा था। गुरु जी ने कहा कि अब तो तुझे बुला लिया ना।

एक बार बाबा जी जब परमात्मा प्राप्ति (Parmatma Prapti) से हताश और निराश होने लगे तब उन्होंने इस जीवन लीला को समाप्त करने की सोची, उस समय (काश्मीर की पहाड़ी की चोटी से मौत को गले लगाने के लिए बाबाजी के कदम बढ़ने ही वाले थे कि यही महापुरूष वहाँ प्रकट हुए और कहा कि चिन्ता मत करो तुझे बुला लूंगा)

जय गुरुदेव जी को नाम दान और परमात्मा प्राप्ति (Naam Daan aur Parmatma Prapti)

जब परम संत बाबा जयगुरुदेव जी महाराज को गुरु मिले उस वक्त बाबाजी के आँसू थमते ही नहीं थे। उसी वक्त बाबाजी को उनके गुरु महाराज ने नामदान (Nam Dan) यानी प्रभु की प्राप्ति का मार्ग बताया और वे साधना में लग गये। चौबीस घण्टे में एक रोटी खाना और 18 घण्टे साधनावस्था में बैठे रहना यह बाबाजी का नियम था।

बाबाजी की डायरी (Baba Ji ki Dayri) से ये मालूम हुआ जिसमें लिखा था कि जब मैं गुरु के पास पहुँचा तो कार्तिक का महीना था। जाड़ा प्रारम्भ हो रहा था। गुरु महाराज ने दर्शन देते ही मुझे उपदेश दे दिया था। मैंने उनकी आज्ञा लेकर साधना प्रारम्भ कर दिया। जिस दिन से साधना शुरू की उसी दिन से चित्त की चंचलता शुरू हो गयी किन्तु गुरु से अर्ज करता रहता था कि मेरा चित्त स्थिर नहीं रहता है।

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वक्त साधना के भाग-दौड़ में लगता रहता है। गुरु (Guru) समझाते थे कि वक्त साधन के तुम हमारे रूप का दर्शन कर लिया करो और जब मन न माने तो रोया करो। जब साधन में चित्त और इन्द्रियाँ चलायमान होती थीं तब मैं गुरु के देह स्वरूप आकार को ध्यान में लाता था। जब गुरु का आकार सामने आता था तब मन, चित्त रूक जाया करता था और किसी जगह भागता नहीं था।

घण्टा, शंख और ऊपर की ध्वनि सुनना

जब Baba Jai Guru Dev Ji Ka चित्त एक जगह रूक गया तो वक्त भजन के शब्द घण्टा, शंख और ऊपर की ध्वनि सुनाई देती थी। धुन सुनने से बहुत आनन्द आता था। मालूम होता था कि मैं गर्मी से सर्दी में आ गया हूँ और यह सर्दी अधिक शीतलता देने वाली है। थोड़ी देर मन, चित्त रूका कि भाग खड़ा हुआ।

कभी कहता था कि तुमको संसार का अनुभव नहीं हुआ है। कभी कहता था कि तुम बगैर धन के कैसे रहोगे? फिर मैं सोचता था कि गुरु कि कृपा (Guru Kirpya) होगी तो सब ठीक रहेगा। फिर समझा मैं बझाकर में भजन में इसको लगाता था।

बाबाजी कभी चिरोली (अलीगढ़) जाकर गुरु महाराज (Guru Maharaj) के पास रहते और सेवा साधन करते। फिर कभी कहीं दूर चले जाते और एकान्त में साधन करते। एक प्रश्न के उत्तर में एक बार बाबाजी ने कहा था कि गुरु के पास रहना खांडे की धार है। इसलिये मैं कभी-कभी चिरौली से दूर जाकर भजन (Bhajan) करता था ताकि गुरु के प्रति (Guru Ke Prti) मेरे मन में प्यार दृढ़ होता रहे और गुरु की मर्यादा भंग न हो।

जय गुरुदेव की कहानी

एक बार की बात है। मेरे पास एक ही धोती थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि कैस नहाऊँ और कपड़े बदल। मुझे स्वामी जी ने बुलाया और कहा कि बेटे! तेरी धोती इतनी गन्दी क्यों है? मैंने दबी आवाज में कहा कि स्वामी जी एक ही धोती है। यह सुनकर उन्होंने कहा कि इसके दो टुकड़े कर लो।

एक साफ कर और दूसरी पहन। गन्दगी अच्छी नहीं है। यह कहकर स्वामी जी ने मुझे पैसे दिये साबुन के लिए। मुझे बड़ी खुशी हुई कि मेरी समस्या सुलझ गई। मैंने समझ लिया कि गन्दगी और है। एक कपड़े में भी साफ रहा जा सकता है।

बाबाजी ने कहा कि हमारे गुरु महाराज (Guru Maharaj) बहुत सरल स्वभाव के थे। गाँव वाले भी उनको नहीं पहचान पाये।केवल इतना ही कहते थे कि पंडित जी बहुत सीधे-साधे है। उनकी एक रचना है जिसे वह अक्सर गाया करते थे।

गुरु महाराज की रचना (Guru Maharaj ki Prathna)

मेरे रंग महल चलि आव, दिखाऊँ तोहे अगमगली॥टेक॥
नैहर बास आस सब छोड़ो, तन मन प्रीत छुड़ानी जी।

जगत लाज और कुल मर्यादा, इनको बंधन जानी जी।
सम्हालूँ तेरी बुद्धि मैली॥ मेरे रंग…॥

तिलको पेल तेल करनिरखो, परखो ज्योति निशानी जी।
नील शिखर की राह पकड़कर सुरत निरत शैलानी जी।
खिली जहाँ कंवल कली॥ मेरे रंग॥

सैल करो और महल निहारो सुना, प्रेमकी बानी जी।
घाटी घाट अगारी देखो, बंकनाल पट छानी जी।
गुरु की लखो मौज अली॥ मेरे रंग…॥

संगीसंग छोड़कर प्यारी, सबसे हो अलगानी जी।
मानसरोवर पैठ अन्हाओ, हंसन मेल मिलानी जी।
रूपलखो अजब अली॥ मेरे रंग…॥

आगे चलो लाखो गति न्यारी, सतगुरू सरन समानी जी।
सतगुरू स्वामी गुरु की दया से, पूरन पद पहचानी जी।

यह धर्मदेव को इन्द्रभोगी शहरों से नास्तिक लोगों ने पकड़ कर बहुत मारा। उन्हें इतना मारा कि वे लंगड़े हो गए। विवश होकर शहर से निकलकर रोते हुए कहते हुए कि मैं अब जंगलों में जा रहा हूँ। धर्मदेव ने फिर कहा कि मैं वहाँ जाकर सो जाऊंगा। जब परेशानियो, दुख तकलीफों में लोग चिल्लायेंगे और मुझे जंगलों में खोजेंगे तब मैं प्रभु के आदेश से लोगों के बीच पाव आऊंगा। बाबा जयगुरुदेव

निष्कर्ष

महानुभाव सज्जनों आपने ऊपर दिए गए कंटेंट के माध्यम से बाबा जय गुरुदेव (Jai Guru Dev) जी का परिचय नाम दान और परमात्मा प्राप्ति के बारे में जाना। उन्होंने किस प्रकार से परेशानी झेली और गुरु कैसे उन्हें मिले? उनके गुरु कौन है? आदि तमाम चीजों को आपने पढ़ा। आशा है ऊपर दिया गया कंटेंट आपको जरूर अच्छा लगा होगा। जय गुरुदेव मालिक सभी पर दया करें। जय गुरुदेव जय गुरुदेव

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