आत्मा दर्शन किसे कहते और कैसे करें? Aatma darshan kaise

जय गुरुदेव भाइयों, Aatma darshan, आत्मा दर्शन किसे कहते हैं और आत्मा दर्शन कैसे पा सकते हैं? वास्तव में गुरु का काम आत्मा दर्शन और परमात्मा दर्शन कराना, जीवात्मा को बाहरी एवं अंदरुनी अलौकिक शक्तियों को उजागर करना, गुरु की कृपा से दिव्य दृष्टि को खुलवाना, वास्तव में यदि हम हर रोज़ नाम धन की कमाई करें तो गुरु का आशीर्वाद मिलता है और उनकी कृपा से हर काम सुलभ हो जाता है। आइए जानते हैं परम संत स्वामी गुरु महाराज जी के अनमोल सत्संग वाणी आर्टिकल के माध्यम से जय गुरुदेव पूरा पढ़ें।

Aatma darshan kaise kare
Aatma darshan kaise kare

गुरु का काम आत्म दर्शन करना (Guru ka kam Aatma darshan karan)

सुरत तीसरे तिल पर पहुँचे और आत्म रूप दर्पण में दर्शन हो उस वक़्त सुरत को ज्ञान होता है कि मैं महापुरूष का अंश हूँ। यही मेरा सच्चा आत्मरूप है। तीसरे तिल पर जो धार है वह अनामी पद से चलकर टिकी है।

इसी तीसरे तिल की धार को सुरतों ने छोड़ दिया है। जब से यह धार छोड़ा है तभी से सुरतें अपने वास्तविक सुख को खो चुकी हैं। संत सतगुरू इसी अनादि धार से जोड़ने के लिये बिछुड़ी हुई सुरतो को मनुष्य शरीर में उपदेश करते हैं।

जो सुरते अपना सम्बन्ध सतगुरु से कर लेती हैं और उनके उपदेश को सुन लेती है उनका तो अनादि धार जो तीसरे तिल में है उससे जुड़ना हो जाता है और जो सुरत संत सतगुरू से अपना सम्बन्ध नहीं कर पाती है उसका आदि धाम से जुड़ना नहीं होता है। बल्कि मनुष्य शरीर गत करके इस मृत्यु लोक में चौरासी खान में चली जाती है।

साधकों अथवा गैर साधकों को यह समझाया जाता है कि इस आत्म फिलास्फी को अपने जीवन में समझने की कोशिश करनी चाहिये। मनुष्य अपनी आत्मा अर्थात सुरत को जगाने के हेतु इस मनुष्य चोले में अपना कार्य आत्म कल्याण का किया तो समझो कि सुरत ने सच्चा कार्य इस मनुष्य देह में आकर कर लिया, वरना जीवन-जीवन न होगा।

आत्म दर्शन किसे और कैसे (Aatma darshan kise or kaise)

जब सुरत दोनों आँखें बन्द करके तीसरे तिल में आत्म दर्शन अपने सच्चे स्वरूप का करती है तो उसे एक प्रकार की जागृति हो जाती है। उस शीशे में देखती है कि मैं इसी स्वरूप की और उसी आईने से दूसरों की भी शकले नज़र आती है।

यहाँ उस शीशे में मालूम होता है कि कौन क्या करता है। साधकों यह गति जब प्राप्त होती है तो उसे एक प्रकार का अहंकार प्रगट हो जाता है। ऐसी अवस्था में यदि साधक कुछ किसी के बारे में कहता है तो उसका कहा हुआ वचन सत्य हो जाता है।

स्त्री पुरुषों। जो तुम साधन गुरु का दिया हुआ, करते हो और अन्त में उनकी शक्ति प्राप्त करते हो, तो तुमको यह विचार करना होगा कि मैं अपनी जमा की हुई पूजी बरबाद न कर दू। सुरत की चाल रूक जाती है कि तुम अपनी शक्ति का दुरूपयोग करते हो।

सुरत उसी तीसरे तिल में होकर देखती है। स्वर्ग भी नज़र आते हैं। बैकुण्ठ धाम भी नज़र आते हैं जो वहाँ की रचना है, सुन्दर आनन्द की वह भी नज़र आती है। देवी और देवता भी नज़र आते हैं। जो रचना यहाँ पर नज़र नहीं आती है वह वहाँ सब दिखाई देती है।

दिव्य दृष्टि परमात्मा दर्शन (Parmatma darshan)

यह साधना गुरु के पास रहकर चन्द दिन में पूरी हो जाती है। गुरु दिव्य देशों के मार्ग को भली भाँति जानता है। वह तुम्हें अपना रास्ता बताकर तुम्हें पहुँचा देता है। मन बुद्धि, चित्त, अहंकार का आपा तुमने ठान लिया है इसी आपे के द्वारा तुम अपने आप को नहीं पहिचान पाते हो।

आपा गुरु के चरनों में रख दो और उससे दिव्य अगोचर, दिव्य दृष्टि मांगो जिसके द्वारा परमात्मा का दर्शन होता है। जब सुरत सहस दल कँवल में पहुँचती है तो बहुत बड़ी शक्ति प्रगट हो जाती है। शक्ति तो तीसरे तिल में भी प्राप्त होती है।

परन्तु सहस दल कॅवल की शक्ति वह शक्ति है जिससे साधू भूमण्डल पर सब कुछ दे देता है यदि उसकी इच्छा आ जावे। इसी अवस्था को पाकर साधु दुनियाँ में रहते हुये आप भी दे दिया करते हैं। इस गति का पहुँचा हुआ आगे नहीं जा सकेगा।

जिस तरह हमें धन पाकर घमण्ड आ जाता है, जन को पाकर घमण्ड आ जाता है, राज्य को पाकर राज्य मद आ जाता है, विद्या मद आ जाता है इसी तरह उस शक्ति को पाकर मद आ जाता है। अपनी ताकत अपनी जगह प्रगट होती है तो उसका मद आना स्वाभाविक है।

हर रोज़ कमाई करना चाहिए (Name ki kamaye)

सन्त मत के अनुयाइयों को जो सुरत शब्द की साधना में लगे हैं उन्हें होशियारी से रहना चाहिए कि कहीं किसी को आशीर्वाद अथवा श्राप न देने लगें। साधन वालों को असर नहीं होता है, परन्तु पूजी में से ख़र्च करेंगे तो अवश्य कम होगी।

जिन साधकों को अन्तर प्रकाश या शब्द मिल रहा है उन्हें अपनी ज़बान पर ताला लगा लेना होगा। साधकों तुम्हें मालूम नहीं है कि उसका क्या असर तुम्हारी साधना पर हो जाता है। साधना नित्य ही करना चाहिए जो रास्ता सुरत शब्द योग का मिल गया है उसको प्रीति और विश्वास के साथ,

हर रोज़ कमाई करना चाहिए क्योंकि तुम्हारी साधना से तरक्क़ी होगी। किसी कारन यदि तुमने साधन में कमी कर दी तो अभ्यास में जो तुमने पाया है, उसमें कमी अवश्य होगी जिससे मालूम होगा कि गुरु की दया अब काम नहीं करती है।

साधन करते समय घबराना नहीं (Sadhna karte samy)

सुरत शब्द के साधकों को साधन करते समय घबराना नहीं चाहिए क्योंकि शब्द तुम्हारी सफ़ाई चाहता है तुम साफ़ हो जाओगे। तुम्हारे अन्दर झीनी माया व्याप रही है जिसकी तुम्हें ख़बर नहीं है। वही झीनी माया तुम्हारे अन्दर एक तरह की फुरना पैदा करती रहती है।

हर प्रकार साधकों की गलती रहती है। साधन ख़ुद नहीं करते हैं और इसी से सतसंग में रूखे फीके बैठते हैं। गुरु उसी वक़्त तुम्हारा जिम्मा लेगा जब तुम साथन करोगे। बहुत लोग सुरत शब्द के मार्ग को ले लेते हैं और समयाभाव में साधन करते हैं बाक़ी और साधन मन इन्द्रिय के होते हैं इस वज़ह से साधन में तरक्क़ी नहीं होती है।

जो साधक गुरु का उपदेश लेकर डवांडोल रहते हैं वह बेचारे जीव सन्तों की कोई वस्तु नहीं पा सकते हैं। सन्त देने के लिए आते हैं और जीव उन्हें नहीं लेता है। जीवों की प्रीति सन्तों के चरनों में होगी तब कुछ उनसे नामदान मिलेगा और किसी जतन से सन्तों का धन नहीं पा सकते हैं। जब सन्त दीन देखते हैं तब नाम देकर बन्धन से मुक्त कर डालते हैं।

पोस्ट निष्कर्ष

महानुभाव अपने परम संत बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के द्वारा दिए गए सत्संग आत्मा दर्शन (Aatma darshan) शब्दों को पढ़ा। आप यह सत्संग शब्द गुरु महाराज की याद और हमें साधना करने में सार्थक होगी, मालिक की दया प्राप्त होगी। आशा है आप को ऊपर दिए गए सत्संग शब्द बहुत अच्छे लगे होंगे जय गुरुदेव मालिक की दया सब पर बनी रहे।

Or Pade:-

  1. जीवात्मा (सुरत) सुख कैसे पाए?
  2. साधना करते वक़्त दया के निशान
  3. गुरु ज्ञान की महिमा बड़ी निराली
  4. साधक के क्या-क्या कर्तब्य होना चाहिये?
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