अपने सच्चे धाम, भेद, मार्गों और मंडलों का वर्णन, आध्यात्मिक संदेश

Jai Guru Dev महानुभाव कुछ स्वार्थी लोग जीवों को उपदेश देने के लिए स्थान-स्थान पर बहुत से प्रगट हो गये। इनकी संगत करने और बचनों को मानने से जीवों को अत्यधिक कष्ट पहुँचा। उनको प्रत्यक्ष धोखा मालूम हुआ। इस कारण से अब यदि कोई सच्चा मार्ग और भेद बताने वाला मिलता है तो उसके बचन को ज्यों का त्यों प्रतीत नहीं करते, नाना प्रकार के भ्रम और भय उत्पन्न करके उन बचनों को नहीं मानते, पुरानी और दोषपूर्ण चालों में बारम्बार फंसे रहना स्वीकार करते हैं और अपने लाभ हानि का बहुत कम विचार करके सच्चे गुरु की खोज में ढीले रहते हैं।

आध्यात्मिक संदेश

परमार्थ की समझ बूझ (Parmarth ki Samjh)

जो जीव मूर्ख और निपट संसारी और चलायमान मन के थे तीर्थ, व्रत और मूर्ति पूजा में अटक रहे। जिन्होंने कि थोड़ी बहुत विद्या पढ़कर अपनी बुद्धि किसी प्रकार जाग्रत की वे ज्ञान के ग्रन्थों के पढ़ने पढ़ाने में वाचक रह गये अर्थात परमार्थ की समझ बूझ किसी प्रकार प्राप्त की किन्तु उनके अनुसार अभ्यास नहीं किया।

इस कारण उनके सुरत का स्थान नहीं बदला और वे निरे बातूनी रह गये। इनमें से कुछ अपने को स्वयं ब्रह्म मानकर निश्चित और निर्भय हो गये। वे अपने मन और इन्द्रियों की चाल और इच्छा को उनका स्वभाव समझ कर निर्द्वन्दता पूर्वक आनन्द विहार और भोगों में,

जब वे भाग्य से मिल गये, भ्रमण करने लगे और गृहस्थों को इसी प्रकार का ज्ञान सिखा कर उनको भक्ति मार्ग से हटा दिया और धर्महीन कर दिया।

मान और सम्मान की प्राप्ति (Man Or Sammn)

आध्यात्मिक संदेश: कोई-कोई जीव तप और अनेक क्रियाओं के साधन में लग गये। जैसे नेती धोती, बस्ती क्रिया करना या मौन साधना, जल शयन करना या पंचाग्नि में तपना सर्वदा तीर्थो में भ्रमण करना या मेले इत्यादि में उल्टे लटकना या कीलों पर बैठना या नंगे रहना अनेक प्रकार के स्वांग बनाकर जगत को रिझाना आदि।

इन क्रियाओं से किसी प्रकार का परमार्थी लाभ नहीं है केवल आंशिक शारीरिक निर्मलता प्राप्त हो सकती है अथवा यहाँ के लोगों को प्रसन्न करके कुछ धन, मान और सम्मान की प्राप्ति हो सकती है।

बहुत से जीव विशेषकर वे जिन्होंने नई विद्या पढ़ी परम प्रभु और सुरत के विषय में अनेक प्रकार के अविश्वास अपने हृदय से उत्पन्न करके परामार्थ से बिल्कुल विमुख हो गये। खान-पान सैर तमाशा परिवार कुटुम्ब धन, सम्पत्ति आदि के मोह में फंस गए।

वे उन्हीं को अपने जीवन का लक्ष्य समझकर प्रसन्न हो गये और परमार्थ का लाभ न समझकर उस प्रकार की कार्यवाई बन्द कर दिये। वे स्वतन्त्रता को पसन्द करके निर्भय और निर्द्वन्द होकर जैसी रहन सहन कि उनको उचित प्रतीत हुई उसी के अनुसार रहने लगे और अपने मन की इच्छानुसार खान पान वेश-भूषा आदि में निवास करने लगे।

वास्तविक आनन्द (Bastvik Aannd)

आध्यात्मिक संदेश संसार की यह दशा देखकर अर्थात जीवों का परमार्थ बिल्कुल बन्द देखकर परम प्रभु सत्त पुरूष संत सतगुरू का रूप धारण करके प्रगट हुये और अति दया करके अपने धाम का भेद मार्गों और मण्डलों का वर्णन और सुरत के वहाँ चढ़कर पहुँचने की युक्ति सरल और निर्विघ्न रूप से आध्यात्मिक संदेश किया।

उन्होंने जीवों को अत्यन्त कृपालुता से समझाया कि नौ द्वारों में सुरत धार का प्रवाह इस लोक में नित्य प्रति हो रहा है और प्रत्येक द्वार पर थोड़ा बहुत रस स्वाद या प्रसन्नता मन को इन्द्रियों के विषय में अर्थात भोगों के द्वारा प्राप्त होती है। इसी प्रकार रस स्वाद प्रसन्नता को प्राप्त होकर कुछ जीव बड़ी रूचि के साथ भोगों में लिपट गये और वास्तविक आनन्द जो मन और सुरत को दसवां द्वार की ओर अग्रसर होने से प्राप्त हो सकता है।

जो आनन्द निर्मल स्थाई और स्वतन्त्र अर्थात जीव के वश में है, उसे भूलकर किसी से उसका भेद और पता न पाकर बिल्कुल अनभिज्ञ रह गये और इस प्रकार अपने जीवन को गहरी हानि पहुँचाई।

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जड़ चेतन की पहली गांट (Jad Chetan)

जड़ चेतन की गांठ प्राकृतिक लगी हुई है। इस संसार में अनेक स्थानों पर जीवों ने आप बन्धन लगाये हैं। अतएव प्रत्येक को उचित है कि मृत्यु के पूर्व उस गांठ को खोलने का यत्न आरम्भ कर दे जगत के बन्धन यथा सम्भव ढीले करे।

आध्यात्मिक संदेशजिससे अन्त समय पर काल की खींचा तानी का दुख और क्लेश न सहन करना पड़े और सहज में छुटकारा पाकर सुरत अपने देश की ओर प्रस्थान करे।

विदित हो कि सुरत के उतार के समय जड़ चेतन की पहली गांट त्रिकुटी के स्थान पर लगी जहाँ कि माया के साथ मिलाप हुआ। आध्यात्मिक संदेश तत्पश्चात श्रेणी प्रति श्रेणी उतार होकर भिलाप बढ़ता गया और यहाँ तक बढ़ा कि सुरत का बन्धन मन, इन्द्रिय और देह के साथ बहुत दृढ़ हो गया।

उत्पत्ति के समय से युवावस्था तक सुरत का विस्तार देह में होता है और अंग में उसका बंधन दृढ़ हो जाता है।

इसी अवस्था में जीव बन्धन (Jeevan Bandhan)

इसी अवस्था में जीव बन्धन यानी कुटुम्ब परिवार बिरादरी और मित्रो आदि से उत्पन्न हो जाता है और अनेक भोगों और पदार्थों में रस पाकर जीव की आसक्ति अधिक हो जाती है।

सारांश यह कि अनेक जीवों, वस्तुओं और भोगों से आसक्ति और बन्धन उत्पन्न करके जीव इस संसार के अधिक दुख और क्लेश सहन करते हैं अर्थात अपने कर्मो का फल भोगने के अतिरिक्त दूसरों के कर्मो का प्रभाव भी (जब के के। उनको दुख होता है) झेलना और सहना पड़ता है और प्रगट में कोई यत्न ऐसे दुखों से बचने का नहीं प्रतीत होता है।

जब मृत्यु का समय आता है उस समय काल मन और सुरत को ऊपर की ओर खींचता है। ये दोनों अपने स्वभाव और आसक्ति के अनुसार अंग-अंग की ओर और भी बाहर के बन्धनों की ओर झोंका खाते और खींचते हैं। इसी खींचा तानी में अधिक दुःख और क्लेश होता है और झटके और झकोले खाने पड़ते हैं।

यहाँ संसार के कर्मो में फंसे (Sansar Ke Karma)

ऐसा कष्ट जो अन्त समय पर थोड़ा या अधिक सब जीवों को प्रगट या गुप्त रूप से सहन करना पड़ता है उसे कम या दूर करने का कोई भी यत्न अथवा चिकित्सा नहीं करता बल्कि बहुत से लोग उससे अनभिज्ञ ही है। वे यहाँ तक संसार के कर्मो में फंसे हुए हैं कि कभी मृत्यु के समय की अवस्था का विचार भी नहीं करते।

परम प्रभु सतगुरू स्वामी दयाल ने संत सतगुरू रूप धारण करके कहा है कि कुल जीवों को चाहे वे पुरूष हो अथवा स्त्री उचित और आवश्यक है कि जीते जी अर्थात इसी जीवन में अपने प्रगट और गुप्त बन्धनों को तोड़ने या घटाने का यत्न आरम्भ कर दें और उस यत्न अथवा उपाय का प्रभाव सुरत शब्द योग के अनुसार अभ्यास करने से प्राप्त होगा।

ध्वनि को पकड़ कर (Sabdh Pakdo)

आध्यात्मिक संदेश, वह यत्न यह है कि जो शब्द घट-घट में प्रतिक्षण हो रहा है उसे ध्यानपूर्वक एकान्त में बैठकर सुने शब्द ध्वनि को पकड़ कर अपने मन और सुरत ऊँचे की ओर चढ़ाये और इसी प्रकार स्थानीय अथवा गुरु स्वरूप का ध्यान नियम से करे तो उसके आधार पर मन और सुरत एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर चढ़ेगे और कुछ रस भी पायेंगे।

इस अभ्यास के करने से अन्तर और बाहर के बन्धन ढीले होंगे। जितना रस मिलेगा उसी अनुसार मन और सुरत सब ओर से हटकर थोड़ा बहुत अपने घर में चढ़ेगे।

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