मानव धर्म और कर्म की स्थापना | जीव आत्मा को जगाने के लिए

जय गुरुदेव, मानव धर्म और कर्म की स्थापना, जय गुरुदेव मानव धर्म और कर्म की स्थापना। जब सृष्टि में उथल-पुथल का समय आता है तो लोग अत्याचारी पापाचारी हो जाते हैं तब भूमंडल पर फकीरों महात्मा अवतरित होकर मानव धर्म कर्म की स्थापना करते हैं। महानुभाव इस आर्टिकल को पूरा पढ़ें, यह सत्संग पुस्तिका के महत्त्वपूर्ण अंश है। जो परम संत बाबा जयगुरुदेव जी महाराज ने सत्संग में सुनाया। चलिए शुरू करते हैं।

Jai  Guru Dev
Jai Guru Dev

मानव धर्म और कर्म की स्थापना (Maanav dharm aur karm ki sthapana)

बाबा जयगुरुदेव ने धर्म-कर्म संदेश सुनाते हुए एक स्थान पर कहा कि उथल-पुथल के समय में संत और फ़क़ीर आए, उन्होंने एक मर्यादा रखी मानव मात्र का आवाहन किया। लोगों को अच्छाइयाँ बुराइयाँ पाप और पुण्य समझाया। जब लोगों ने उनकी मर्यादाओं को देखा उनके उपदेश को समझा।

तो यह समझ में आया कि हम सब मोहमाया में फंस रहे थे। जब वह महात्मा मिलते हैं तो हम इस मोह का त्याग करने लगते हैं और उस शिवरात्रि शिवदृष्टि की ओर चलने लगते हैं। जब तक हम उन महापुरुषों का प्रयोगशाला में प्रवेश नहीं करेंगे। तब तक हम कुछ भी समझ नहीं पाएंगे।

यहाँ कुछ लोग पगड़ी बाँधकर आते हैं और यह समझाते हैं कि हम बाबाजी का सारा भेद ले लिया। जो चौबीसों घंटे साथ रहते हैं वह तो बाबाजी का भेद ले ही नहीं सकते। आप क्या लेंगे? हम बोलते नहीं पर आप की चालाकी चतुराई और फितूर को देखते रहते हैं। ऐसे स्थान पर भी आप सीधे होकर नहीं आ सके और फायदा ना ला सके तो अब क्या कहा जाए.

अपनी जीव आत्मा को जगाने के लिए (jeev aatma ko jagane ke lie)

यह शरीर चंद रोज़ का है इसमें अपनी जीव आत्मा को जगाने के लिए नाम से जुड़ने के लिए मिला है। मदद ना ली तो यह मकान आपका गिर जाएगा। जो कुछ भी आपने अपने सुख के लिए जमा किया है वह सब पड़ा रह जाएगा। फरिश्ते आपको ले चलेंगे। वहाँ न्याय होगा।

उसके यहाँ भी अनेक प्रकार के दंड संहिता बनी है। उसने अनेक कारागार बनाए हैं। उसमें ले जाकर तुम फेंक दिए जाओगे, कोई भी निकालने वाला नहीं होगा। हम लोग भी ऐसे भारत भूमि में उस महापुरुष के समक्ष अपने आप को समर्पण कर देना चाहिए,

ताकि हमारी जिम्मेदारी उनके हाथ में चली जाए और हमें वहाँ रास्ता बता दें कि भविष्य में ना अछाइये रहे ना बुराई रहे और जो कुछ किया है वह उनके हाथ में चला जाए, उसे वह छमा करें या ना करें,

भारत के भक्तों ने प्रेरणा दी (bharat ke bhakto ne prerana di)

यह भारत के भक्तों ने हम सब को प्रेरणा दी और यह बताया कि जब तक आप यह काम नहीं करोगे तो कौन आपकी जिम्मेदारी लेगा। जो वक़्त सुहावना हमें मिला है उसमें हम एक काम करले, चाहे बीमारी, रोग शोक है। अमीरी ग़रीबी में यह समय मिले आप को यह भेद बता दिया जाएगा।

वह रास्ता दिखा दिया जाएगा कि और कोई झगड़ा नहीं रह जाएगा और हमारी जिम्मेदारी वह महापुरुष उठा ले, इसके लिए हम को अपना परिश्रम करना ही चाहिए, हम जल्दी से निर्मल हो जाएंगे। पक्का और शुद्ध हो जाएंगे। द्वार खुल जाएंगे।

आत्मा जो अपने अस्तित्व को समाप्त कर चुके थे, जाग जाएगी। जब परमात्मा की बोली समझ में आएगी। वह कितने प्यार की अमृत भरी बोली है, जिसे सुनकर मीरा, कबीर, नानक, आदि अनेक संत और फकीरों ने अपना सब कुछ भुला दिया।

मानव यदि स्वस्थ रहना चाहता (yadi svasth rahana chaahate)

उस बोली को सुनने के लिए तरह-तरह के उन्होंने कष्ट उठाए और लिखकर यह सिद्ध करना चाहा कि लोग भी उनको सुने और समझे। पर तुम उसको छोड़कर इधर की तरफ़ भाग चले उसका परिणाम यह हुआ कि सारा राष्ट्र एक अनाथ की तरह जल रहा है।

रिसी मुनियों के सूत्र में बाँधे, राज्य कभी अनाथ नहीं होता है। राज्य राजा करते हैं। ऋषि मुनि महात्मा उन पर अपनी धार्मिकता का अंकुश रखते हैं, अब कुछ भी नहीं रह गया। अनाथ अवस्था में एक खोज होने लगी कि कोई भी आ जाए, वह राम हो, कृष्णा हो, मीरा या कबीर हो, चाहे कोई आकर व्यवस्था दे, मानव यदि स्वस्थ रहना चाहता है तो परिश्रम करना ही होगा।

भजन में तरक्क़ी ना होने का कारण क्या (bhajan mein tarakki na hone ka karan kya)

कुछ महत्त्वपूर्ण सवाल जवाब स्वामी जी भजन में तरक्क़ी ना होने का कारण क्या है? भजन में तरक्क़ी का ना होने मन के ऊपर निर्भर करता है। मन एकाग्र होना और अंतर में फसाना नहीं चाहता है। पिछले अनगिनत जन्मों से इसे बिखरे रहने और एस्थर करने में समय लगेगा।

प्रेम और विश्वास के साथ भजन ध्यान में समय दो, गुरु अंतर में सूक्ष्म रूप में तीसरे तिल में बैठा हुआ है। निरंतर सब को देखता रहता है। आत्मा के ऊपर जो कर्मों का मेल जमा है उसके साफ़ होते ही बीच का पर्दा हट जाएगा,

और गुरु के देवी देवताओं के दर्शन हर समय होने लगेंगे। जीवात्मा जब इस शरीर से ध्यान भजन के वक़्त अलग होकर आकाश में उड़ती है, तो उसका पहला क़दम स्वर्ग में पड़ता है। आध्यात्मिक साधना की यह शुरुआत है। जय गुरुदेव

चिंताओं को दूर रखकर भजन ध्यान सुमिरन करो (bhajan dhyaan sumiran karo)

सतगुरु का पत्र साधक को, इस संसार में किसी भी व्यक्ति को सुखी पाना कठिन है। एक ना एक दुख सबको लगा हुआ है। कोई ना कोई चिंता सबको लगी हुई है। अगर तुम यह चाहो कि सब चिंताओं से मुक्त होकर भजन करो, तो यह नामुमकिन है।

24 घंटे में 2 घंटे सभी चिंताओं को दूर रखकर भजन, ध्यान, सुमिरन करो। मन को रोक कर जब यह अभ्यास करोगे और आनंद धीरे-धीरे आने लगेगा। तब दुखों का चिंताओं का कम असर होगा।

अपने ध्यान को अंदर में जब ले जाओगे और घंटे की स्पष्ट आवाज़ सुनाई देने लगेगी। तो उस लिंग लोक की दुनिया चिंताओं और परेशानियों से राहत है। स्थाई सुख और शांति तुम्हारे अंतर में हैं। भजन करो और देखो जब अनुभव होने लगेगा तब धोखा किस बात का, इसलिए अभ्यास रोज़ करना चाहिए, नागा ना होने पावे, शाम को भोजन हल्का-फुल्का रहेगा तो नींद और सुस्ती नहीं रहेगी।

पोस्ट निष्कर्ष

महानुभाव, सत्संग प्रेमियों, जय गुरुदेव प्रेमियों आपने इस आर्टिकल के माध्यम से जाना धर्म की स्थापना और बाबा जी ने अपने सत्संग कार्यक्रम में अपने प्रेमियों को संदेश दिए, उनके कुछ महत्त्वपूर्ण अंश आपने पढ़े। आशा है आपको यह बाबाजी की सत्संग वाणी ज़रूर अच्छे लगे होंगे। आप इस सत्संग वाणी को इंटरनेट पर सोशल नेटवर्क के माध्यम से ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करें, पोस्ट पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। जय गुरुदेव नीचे दी गई और आर्टिकल पढ़ने के लिए क्लिक करें।

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