कर्म और अकर्म क्या साधक का कर्म क्या होना चाहिए?

कर्म अकर्म क्या है? एक साधक को क्या कर्म करना चाहिए? ताकि साधक की साधना पॉजिटिव रहे और गुरु भक्ति का आशीर्वाद मिले। साधक को साधना करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? कौन से कार्य करना चाहिए और कौन से कार्य नहीं करना चाहिए. आदि सत्संग की अनमोल बातों को हम आपके साथ सांझा कर रहे हैं। आप इस सत्संग आर्टिकल को पूरा पढ़ें, जय गुरुदेव।

Sadhak ka kram kya hona chahiye
Sadhak ka kram kya hona chahiye

कर्म और अकर्म क्या है? (Karm Or Akaram)

महानुभाव कर्मों का रहस्य अति सूक्ष्म और बहुत अधिक बारीक है। इसे समझना थोड़ा असंभव है, हाँ यदि महापुरुषों की कृपा हो जाए तो कर्मों की रहस्य को आसानी से समझा जा सकता है। कर्मों के बस होकर जीव अनादि काल से एक नट की तरह नाच रहा है। भटक रहा है।

कर्म वासनाओं के आधार पर होते हैं। जैसे जिसकी वासनाये वैसे ही कर्म, अपनी इंद्रियों द्वारा करेगा। फिर उसका भोक्ता बनेगा। अकर्म आंखों के ऊपर हैं यदि शरीर कर्म से छुटकारा पाना चाहते हो तो गुरु के पास पहुँचकर आंखों के ऊपर जो रास्ता सुरत के जगाने का है।

जहाँ पर सुरत को होश दिलाया जाता है। उस अवस्था में पहुँचकर कर्म कट जाते हैं और सुरत अकर्म गति प्राप्त कर लेती है। ऐसे अकर्म गति बगैर महान आत्माओं को प्राप्त नहीं होती है। शरीर कर्म का बंधन सदा से चला आता है और हम इतने ज़्यादा अभ्यस्त शरीर मोहित के हो गए कि इसे छोड़ना भी पसंद नहीं करते है। मुझे तो इसका बहुत दुख होता है।

दुनिया के लोग लालच के वशीभूत (Duniya Ke Log)

दुनिया के लोग लालच के वशीभूत होकर नाच रहे हैं। उन्हें ज्ञान अज्ञान का पता नहीं है। जड़ वासनाओं से इस चेतन शक्ति के अनुभव चाहते हैं और उसी का दिग्दर्शन चाहते हैं। उन्हें अफ़सोस करना चाहिए,

तुम्हारे अंदर ही नाद हो रहे हैं क्यों नहीं सुनते हो? रतन जवाहरात की खदान तुम्हारे पास है। तुम उस से महरूम हो। गुरु से युक्ति लेकर उन अनमोल जवाहर को प्राप्त करो। जब तुम गुरु के पास जिज्ञासु बनकर पहुँचेंगे और अमोलक नाम धन पाने का प्रश्न गुरु से करोगे।

तो यह सत्य है कि गुरु का नाम धन ज़रूर देगा। तुम्हारी जिज्ञासा गुरु को मालूम है वह जानता है कि तुम नाम धन चाहते हो, या तुमने अपने स्वभाव के अनुसार प्रश्न किया है।

संसारी लोग (Sansari Log)

बहुत से लोग गुरु के पास पहुँच जाते हैं कि किसी आदमी के जरिए से या उनको दूसरी जगह बैठने या गप्पे मारने को, ना मिले तो चले महात्मा के पास आकर एक प्रश्न कर दिया। यदि उन्हें समझा दिया जाए और समझ में भी आए पर अपने मुड़ अज्ञान भाव से उसे छुटकारा कर फिर उसी अनिच्छा स्वभाव में बरतने लगे।

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ऐसे लोग जिज्ञासु नहीं होते हैं। वह तो अपना समय नष्ट कर चुके हैं दूसरों का समय जाया करते हैं। मैं तो यह कहता हूँ कि कीमती वक़्त किसी का कोई जाया करता है तो उसे पाप का भागी बनाना होगा और एक दिन उसके लिए भी आता है। जबकि उसे पछताना होगा। यह मत समझो कि किसी को धोखा देता हूँ तो मेरे लिए धोका नहीं होगा। धोखा तुम्हारे लिए भी अवश्य होगा।

मनुष्य की करनी का फल (Karni Ka Fal)

मनुष्य की करनी का फल सबके सामने देर अबेर आएगा। यदि हम किसी के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं या किसी के साथ बुरा व्यवहार करते हैं, तो इन दोनों का परिणाम हमारे सामने अवश्य आएगा।

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परमात्मा हमारे लिए नहीं है पर परमात्मा के लिए हम हैं। उसे नहीं देखते हैं वह हमको देखता है। हमने वह आँख नहीं हम जो उसे देखें। उसमें वह आँख है जो मुझे देखता है। जो परमात्मा की सत्ता के साथ जुड़ जाते हैं। वह परमात्मा को सब जगह देखते हैं। हम परमात्मा से जुदा हैं इसलिए परमात्मा सब जगह मौजूद नहीं हैं।

हमारे कर्तव्य (Hamara Kartavy)

तुम यह कोशिश करो कि परमात्मा के साथ जुड़ जाओ. यदि तुम्हें रास्ता नहीं मिल रहा है तो तुम गुरु के पास पहुँचो। वह तुम्हे परमात्मा के साथ जुड़ने का भेद देगा। गुरु वह शक्ति है जो परमात्मा के साथ जुड़ी हुई है।

बाहर की आंखें से हम मनुष्य गुरु देखते हैं। समय तो यह है कि जो आत्मा परमात्मा की सत्ता के साथ जुड़कर उसकी तदरूप हो गए, वह उस परमात्मा का रूप है जो अपनी सत्यता गुरु रूप से प्रकट करता है। अर्थात अपना बोध कराता है।

Sadhak ka kram kya hona chahiye
Sadhak ka kram kya hona chahiye

जीवन के लक्ष्य का निशाना मुर्गाबी जानती है, पतंग अपने लक्ष्य को समझता है, हंस अपने को समझता है, पक्षियों की यह हालत है जो कि अपने वसूल को समझ रहे हैं। पर अफ़सोस है कि हम मनुष्य नहीं समझ रहे हैं। स्वार्थ भाव में आकर कर्म करें और अपने विचारों से कुछ ना समझे यह हमारी भूल है।

साधक के कर्तव्य (Sadhak Ka Kartavy)

हर क्रिया आपको उतनी ही करनी होगी, जितना कि हम अपने शरीर के स्वस्थ को क़ायम रख सके. परमारथ कमाने के साथ साधक को ज़्यादा फसाव संसार में नहीं रखना चाहिए, साधक को फसाव ज़्यादा संसार में रहा तो जब साधक साधना में बैठेगा।

उस वक़्त उसका मन नहीं लगेगा और अकुलाकर साधन छोड़ देगा। साधन करने वाले में इस बात की बहुत बड़ी कमी रहती है। जो दूर नहीं कर पाते हैं। या तो साधक अपना स्वभाव साधन के वक़्त ऐसा डाल ले कि जब साधन में बैठे उस वक़्त हम सब काम छोड़कर साधन में अपना चित्त लगाए रखें।

जब तक साधक इस सुभाव का साधन नहीं करेगा तब तक मन सुरत एकाग्र नहीं होंगे। गुरु के साथ साधक का स्वभाव बदल जाता है तब साधक साधन में सफलता प्राप्त कर लेता है। जब तक इंद्रियाँ स्वभाव की कमी नहीं होगी। तब तक सूरत जागेगी नहीं।

सुरत को नाम के साथ जोड़ना (Surt Nam Ke Sath)

जब तक इंद्रियाँ स्वभाव में कमी नहीं होगी। तब तक सुरत जागेगी नहीं, आंख, कान, जवान, नाक, इंद्रियाँ इनका फ़साव भोगों के साथ है। यह इंद्रियाँ भोगो के साथ लगकर गुलाम बन गई हैं।

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मन, इंद्री द्वारों पर बैठकर द्वार का पहरेदार बन गई हैं और सुरत मन की खिदमतदारी करती है। इसी से लोग संसार में फंसे हुए हैं। जब इंद्रियाँ यानी आंख, कान, नाक, जवान, इंद्रियों का भोगों से बैराग हो तब मन इंद्रिय द्वार पर बैठकर रस लेना बंद कर देगा और बाद में सुरत को नाम के साथ जुड़ने का मौका मिलेगा।

पर गुरु दयाल मिले और अपनी कृपा से इंद्रियों को और मन को समझौता देकर मोड़े तब किसी समय यह मन मानेगा। मन भोगों का दास बना हुआ है। दास कभी नहीं चाहता कि हम राजमहल के सुख छोड़ दें और उस गुलामी का आनंद आते हैं।

संत कृपाल होते हैं (Sant Krpalu)

संत कृपालु होते हैं। मन को समझा कर अंतर में सुख बक्शते हैं। तब सच्चे स्वाद रस की ख़बर पड़ती है। फिर भी मन अपने स्वभाव अनुसार सच्चा परख पाकर भी उसे ठुकरा देते हैं। मन अपनी आदत से मजबूर है।

लोग शिकायत करते हैं कि हमें अंतर में शब्द और प्रकाश मिलता था और अब क्या हो गया। जो कि शब्द बंद हो गया। साधक को समझाया जाता है कि हर स्वास के साथ कर्मों का खजाना चल रहा है।

साधन में जब तरक्क़ी होती उस वक़्त स्वास के साथ मलीन पर्दा नहीं है। इसको ध्वनि सुनाई देती है अथवा प्रकाश नज़र आता है। जिन-जिन स्वाशो के साथ पाप किए हैं जब वह उनके साथ हो जाता है, तब साधक शिकायत करता है कि आप गुरु दया नहीं हो रही है।

साधन में लगे रहना चाहिए (Sadhan Me Lage Rahna)

साधक को समझा जाता है कि गुरु दया का बैग हर वक़्त जारी है। उस उसने अपने संकल्प शक्ति दी, उसे इच्छाशक्ति से साधक की तरक्क़ी होती है। साधन में लगे रहना चाहिए, स्वाश के साथ बाले कर्म कट जाएंगे और बाद में शब्द सुनाई देगा।

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प्रकाश भी ज़्यादा दिखाई देगा और गुरु की कृपा रहती रही तो अब आगे बहुत ज़्यादा तरक्क़ी होगी। साधन करने वाले साधक गुरु के शब्दों को भूल जाते हैं। इसी कारण उन्हें यह दशा भोगनी पड़ती है और अविश्वास के दायरे में आकर कुल मालिक की दया छुटकारा देते हैं।

पोस्ट निष्कर्ष

महानुभाव अपने ऊपर दिए गए अनमोल सत्संग वचनों को पढ़ा। जो एक साधक को साधना करते समय ध्यान रखना चाहिए, अपने कर्मों की सादगी ही मालिक की दया के पात्र होते हैं और अधिक सत्संग आर्टिकल पढ़ने के लिए, नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें। जय गुरुदेव

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